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Wednesday, November 18, 2015

 क्या हैं अध्यात्म जगत ?

 क्या हैं अध्यात्म जगत ?

जब आध्यात्मिक संत महात्माओं से अध्यात्म ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब सबसे पहले निराकार ब्रह्म ज्योति का दर्शन होता है। दर्शन किसको होता है? वह जीवात्मा को होता है। जैसे सूर्य बादलों से ढंका रहता है, वैसे ही आत्मा रूपी सूर्य की जड़ प्रकृति के तत्वों से ढंका हुआ रहता है।

आत्मा की चमक से ही हमारे मुख मंडल में चमक हो रही है, आंखों में रोशनी हो रही है। प्राण के अंदर जो अविनाशी शब्द है, जब साधन उसमें अपनी सुरति जोड़कर अभ्यास करता है, तो जीवन के अंदर ब्रह्म सूर्य की शक्ति से सूक्ष्म जगत दिखाई देता है। यही तो अध्यात्म जगत है।


जब साधक शब्द का अभ्यास करता है, तब ब्रह्म सूर्य की किरणों से ज्ञान रूपी अग्नि प्रकट होती है। इसी को योग अग्नि भी कहते हैं। योग अग्नि भौतिक सूर्य की अग्नि व यम की अग्नि से भी तेज होती है। जैसे सूर्य के उदय होने पर बिजली के बल्ब आदि की रोशनी शून्य हो जाती है। उसी प्रकार योगी जब योग अग्नि को प्रकट कर लेता है तब जड़ प्रकृति के वे सभी सूक्ष्म तत्व जल कर भस्म हो जाते हैं। जिन्होंने आत्मा के प्रकाश को रोक रखा था। फिर आत्मा रूपी सूर्य की रोशनी प्रज्वलित हो जाती है।

चित्त की ये समग्र वृत्तियां जो संसार की तरफ वरत रही थी, अब मुड़ कर आत्मा की तरफ बरतने लग जाती है। मन का अहंकार समाप्त हो जाता है, आत्मा अपने यथार्थ स्वरूप में स्थित हो जाती है। प्रकृति रूपी पत्नी का जड़ प्रभाव समाप्त होकर वह आत्मा रूपी पवित्र पुरुष पति में समा जाती है। अर्थात्‌ प्रकृति का रूहानी पवित्र भाग आत्मा रूपी पुरुष में एकाकार हो जाता है।

अब योगी को भूत भविष्य व वर्तमान का ज्ञान हो जाता है और वह काल के भय से निर्भय हो जाता है, प्रकृति उसके बस में हो जाती है। वह अब उसको पग पग पर सहयोग रकती है, यही आत्मा व परमात्मा का मिलन भी है। यही पतिव्रता धर्म भी है।

कई लोगों का कथन है, कि आत्मा परमात्मा में मिलकर वापस नहीं आती, इसको बहुत लोग सही भी मानते हैं। कि जैसे नदी सागर में मिलकर उसमें समा जाती है, उसी प्रकार आत्मा भी परमात्मा में मिलकर उसमें समा जाती है। यह उदाहरण सही नहीं है। यह कच्चे साधकों का अनुमान हैं।

जब प्रकृति आत्मा रूपी पुरुष के साथ एकाकार हो जाती है, तब वह आत्मा ब्रह्म सागर से वापस भी आती है और अपनी इच्छानुसार लोक कल्याण के लिए संसार में जन्म भी ले लेती है। आत्मा प्रकृति के बंधन से मुक्त हो जाती है।

क्या हैं अध्यात्म जगत ?

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Tuesday, November 10, 2015

आत्मा

आत्मा



भगवान विष्णु

 के अनुसार हर चेतन प्राणी में एक अभौतिक आत्मा होती है, जो सनातन, अव्यक्त, अप्रमेय और विकार रहित है। हिन्दू धर्म के मुताबिक मनुष्य में ही नहीं, बल्कि हर पशु और पेड़-पौधे, यानि कि हर जीव में आत्मा होती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा आत्मा के लक्षण इस प्रकार बताए गए हैं:

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नाय भूत्वा भविता वा न भूय:।अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ २-२०॥


(यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न तो मरता ही है तथा न ही यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य सनातन, पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।)

किसी भी जन्म में अपनी आज़ादी से किये गये कर्मों के मुताबिक आत्मा अगला शरीर धारण करती है। जन्म-मरण के चक्र में आत्मा स्वयं निर्लिप्त रह्ते हुए अगला शरीर धारण करती है। अच्छे कर्मफल के प्रभाव से मनुष्य कुलीन घर अथवा योनि में जन्म ले सकता है जबकि बुरे कर्म करने पर निकृष्ट योनि में जन्म लेना पड्ता है। जन्म मरण का सांसारिक चक्र तभी ख़त्म होता है जब व्यक्ति को मोक्ष मिलता है। उसके बाद आत्मा अपने वास्तविक सत्-चित्-आनन्द स्वभाव को सदा के लिये पा लेती है। मानव योनि ही अकेला ऐसा जन्म है जिसमें मनुष्य के कर्म, पाप और पुण्यमय फल देते हैं और सुकर्म के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति मुम्किन है। आत्मा और पुनर्जन्म के प्रति यही धारणाएँ बौद्ध धर्म और सिख धर्म का भी आधार है। 

आत्मा

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