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Saturday, July 9, 2016



कुछ कडवे सच प्रभु सुन पाओ तो सुनाऊ?
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ? एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ?
कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ?
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी
कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊँ ?
कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं
कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता
आप तो कई कलाओं के स्वामी हो स्वप्न दूर द्रष्टा हो, गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?
सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालाक होता है उसका रक्षक होता है आप जैसा महा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन आपकी प्रजा को ही मार रहा था आपनी प्रजा को मरते देख आपमें करूणा नहीं जगी ?
क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे
आज भी धरती पर जाकर देखो
अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे
हर घर हर मंदिर में
राधा रानी के साथ ही खड़े नजर आओगे
" राधे राधे"

कुछ कडवे सच प्रभु सुन पाओ तो सुनाऊ?

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जय कृष्ण हरे श्री कृष्ण हरे .
दुखियों के दुख दूर करे जय जय जय कृष्ण हरे ..
जब चारों तरफ़ अंधियारा हो आशा का दूर किनारा हो .
जब कोई ना खेवन हारा हो तब तू ही बेड़ा पार करे .
तू ही बेड़ा पार करे जय जय जय कृष्ण हरे ..
तू चाहे तो सब कुछ कर दे विष को भी अमृत कर दे .
पूरण कर दे उसकी आशा जो भी तेरा ध्यान धरे .
जो भी तेरा ध्यान धरे जय जय जय कृष्ण हरे ..

जय कृष्ण हरे श्री कृष्ण हरे

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Sunday, January 3, 2016

श्री कृष्ण ने चीर हरण क्यों किया 

श्री कृष्ण ने चीर हरण क्यों किया

चीर हरण के प्रसंग को लेकर किसी भी तरह की शंकाएँ नहीं होनी चाहिए.क्योकि जिस प्रकार भगवान चिन्मय है उसी प्रकार उनकी लीला भी चिन्मयी ही होती है यू तो भगवान के जन्म-कर्म की सभी लीलाएँ दिव्य होती है परन्तु व्रज की लीला,व्रज में निकुंजलीला,ओर निकुंजो में भी केवल रसमयी गोपियों के साथ होने वाली मधुर लीला,तो दिव्यातिदिव्य और सर्वगुह्तम है

यह लीला सर्वसाधारण के सम्मुख प्रकट नहीं है अंतरग लीला है और इसमें प्रवेश का अधिकारी केवल श्री गोपिजनो को ही है.विधि का अतिक्रमण करके कोई साधना के मार्ग में अग्रसर नहीं हो सकता परन्तु हदय की निष्कपटता, और सच्चा प्रेम,विधि के अतिक्रमद को भी शिथिल कर देता है.

*गोपियों श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए जो साधना कर रही थी उसमे एक त्रुटि थी.वे शास्त्र मर्यादा और परंपरागतमर्यादा का उल्लघन करके नग्न स्नान करती थी यधपि यह क्रिया अज्ञानपूर्वक ही थी तथापि भगवान के द्वारा इसका मार्जन होना आवश्यक था.भगवान ने गोपियों से इसका प्रायश्चित भी करवाया जो लोग भगवान के नाम पर विधि का उल्लंघन करते है उन्हें यह प्रसग ध्यान से पढ़ना चाहिए भगवान शास्त्र विधि का कितन आदर करते है.

श्री कृष्ण चराचर प्रकृति के एकमात्र अधीश्र्वर है समस्त क्रियाओ के कर्ता भोक्ता और साक्षी भी वही है ‘ऐसा एक भी व्यक्त या अव्यक्त पदार्थ नहीं है जो बिना किसी परदे के उनके सामने न हो’.वे सर्वव्यापक है, गोपियों के गोपो के और निखिल विश्व के वही आत्मा है. हमारी बुद्धि, हमारी द्रृष्टि, देह तक ही सीमित है इसलिए हम श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रेम को भी केवल दैहिक और कामनाकलुषित समझ बैठते है उस अपार्थिव और अप्राकृत लीला को इस प्रकृति के राज्य में घसीट लाना हमारी स्थूल वासनाओ का परिणाम है .“ चिरकाल से विषयों का ही अभ्यास होने के कारण बीच-बीच में विषयों के संस्कार व्यक्ति को सताते है.

*श्रीकृष्ण गोपियों के वस्त्रों के रूप में उनके समस्त संस्कार के आवरण अपने हाथों में लेकर पास ही कदम्ब के वृक्ष पर चढ़ कर बैठ गये. गोपिया जल में थी, वे जल में सर्वव्यापक, सर्वदर्शी, भगवान से, मानो अपने को गुप्त समझ रही थी -वे मानो इस तत्व को भूल गयी थी कि श्रीकृष्ण जल में ही नहीं है,स्वयं जलस्वरुप भी वही है उनके पुराने संस्कार श्रीकृष्ण के सम्मुख जाने में बाधक हो रहे थे.

वे श्रीकृष्ण के लिए सबकुछ भूल गयी थी परन्तु अब तक अपने को नहीं भूली थी - वे चाहती थी केवल कृष्ण को,परन्तु उनके संस्कार बीच में एक पर्दा रखना चाहते थे प्रेम, प्रेमी और प्रियतम के बीच में,एक पुष्प का भी पर्दा नहीं रखना चाहता.प्रेम की प्रकृति है सर्वथा व्यवधान रहित,अबाध,और अनन्त मिलन.

गोपियों ने मानो कहा – श्रीकृष्ण हम अपने को कैसे भूले? हमारी जन्मो-जन्म की धारणायें भूलने दे. तब न. हम संसार के अगाध जल में आकंठमग्न है,जाड़े का भी कष्ट है,हम आना चाहने पर भी नहीं आ पाती है,तुम्हारी आज्ञा का पालन हम करेगी परन्तु निरावरण करके अपने सामने मत बुलाओ.साधक की यह दशा –भगवान को चाहना और साथ ही संसार को भी नहीं छोडना संस्कारो में ही उलझे रहना - बड़ी द्विविधा की दशा है.

भगवान यही सिखाते है कि संस्कारशून्य होकर, निरावरण होकर, माया का पर्दा हटाकर, मेरे पास आओ. अरे, तुम्हारे यह मोह का पर्दा तो मैने छीन लिया है तुम इस परदे के मोह में क्यों पड़ी हो ? यह पर्दा ही तो परमात्मा और जीव के बीच में बड़ा व्यवधान है परमात्मा का यह आवाहन भगवत्कृपा से जिसके अंतर्द्रश में प्रकट हो जाता है वह प्रेम में निमग्न होकर सब कुछ छोडकर श्रीकृष्ण के चरणों में दौड़ा आता है वह न तो जगत को देखता है,न अपने को. भगवान स्वयं अपनी स्मृति से जगाकर फिर जगत में लाते है उन्होंने कहा गोपियों तुम्हारा संकल्प सत्य होगा आने वाली शरद रात्रियो में हमारा पूर्ण रमण होगा. भगवान ने साधना सफल होने की अवधि निर्धारित कर दी.”

जब एक भक्त या साधक भक्ति रूपी यमुना में नहाने जाता है तो अपने कपट रूपी वस्त्र किनारे पर ही रख देता है क्योकि भक्ति में कपट का क्या काम फिर उस भक्ति में डूब जाता है जब भगवान देखते है कि ये मेरी भक्ति में उतार ही गया है तो कही वापस आकर फिर कपट रूपी वस्त्र ना पहन ले इसलिए भगवान झट से उन कपट रूपी वस्त्रों कको उठा लेते है.क्योकि ए कपट ही भगवान और भक्त के बीच का पर्दा है जो उन्हें मिलने नाही देता.ये तो कृष्ण कि कृपा है कि भक्त का इतना ध्यान रखते है.

*एक बात - बड़ी विलक्षण है भगवान के सम्मुख जाने के पहले जो वस्त्र समर्पण की पूर्णता में बाधक हो रहे थे. वही भगवान की कृपा, प्रेम, वरदान प्राप्त होने के पश्चात ‘प्रसाद’ स्वरूप हो गये इसका कारण है भगवान का सम्बन्ध - भगवान ने अपने हाथों से उन वस्त्रों को उठाकर फिर उन्हें अपने उत्तम अंग कंधे पर डाल लिया, उनका संस्पर्श पाकर वस्त्र कितने अप्राकृत रसात्मक हो गये. असल में यह संसार तभी तक बाधक है जब तक यह भगवान से सम्बन्ध और भगवान का प्रसाद नहीं हो जाता .वे वस्त्र नहीं रहे वे तो कृपा प्रसाद हो गये .इसलिए गोपियों ने पुनः वस्त्र धारण कर लिए.

!! जय जय श्री राधे !!

श्री कृष्ण ने चीर हरण क्यों किया

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श्री सनातन जी और पारस पत्थर

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

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सनातन जी अपना सब कुछ दान करके महाप्रभु के सेवक बन गये थे और उनकी आज्ञा से वृन्दावन मे भक्ति का प्रचार करते थे.सनातन जी एक दिन यमुना में स्नान करने के निमित्त जा रहे थे रास्ते में एक पारस पत्थर का टुकडा़ इन्हें पडा़ मिला, इन्होने उसे वही धूलि में ढक दिया.

अकस्मात उसी दिन एक ब्राहाण उनके पास आकर धन की याचना करने लगा इन्होने बहुत कहा -भाई हम भिक्षुक है माँगकर खाते है,भला हमारे पास धन कहाँ है किन्तु वह कहने लगा – महाराज! मैंने धन की कामना से ही अनेको वर्षो तक शिव जी की आराधना की,उन्होंने संतुष्ट होकर रात्रि के समय स्वप्न में मुझसे कहा -हे ब्राहाण तू जिस इच्छा से मेरा पूजन कर रहा है वह इच्छा तेरी वृन्दावन में सनातन जी गोस्वामी के समीप जाने से पूरी होगी बस उन्ही के स्वपन से में आप की शरण में आया हूँ.

इस पर सनातन जी को उस पारस पत्थर की याद आई उन्होंने कहा -अच्छी बात है मेरे साथ यमुना किनारे आओ,दूर से ही इशारा करते हुए उन्होंने कहा -यहाँ कही पारस पत्थर है उस ब्राहमण ने बहुत ढूँढा,थोड़ी देर बाद उसे पारस पत्थर मिल गया उसी समय उसने एक लोहे का टुकड़े से उसे छुआकर उसकी परीक्षा की देखते ही देखते लोहा सोना बन गया ब्राहाण प्रसन्न होकर घर चल दिया.

वह आधे रास्ते तक पँहुचा की उसका विचार एकदम बदल गया उसने सोचा जो महापुरुष घर-घर जाकर टुकडे माँगकर खाता है और संसार की इतनी बहुमूल्य समझी जाने वाली इस मणि को स्पर्श तक नहीं करता अवश्य ही उसके पास इस असाधारण पत्थर से बढकर भी कोई और वस्तु है मै तो उनसे उसी को प्राप्त करुँगा !

इस पारस को देकर तो उन्होंने मुझे बहलाया है, यह सोच कर वह लौटकर फिर इनके समीप आया और चरणों में गिरकर रो-रोकर अपनी मनोव्यथा सुनाई उसके सच्चे वैराग्य को देखकर इन्होने पारस को यमुना जी में फिकवा दिया और उसे अमूल्य हरिनाम का उपदेश किया जिससे वह कुछ काल में ही संत बन गया.

किसी ने सच ही कहा है –
“ पारस में अरु संत में, संत अधिक कर मान |
वह लोहा सोना करै यह करै आपु समान ||”

!! जय जय श्री राधे !

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

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Friday, January 1, 2016

श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए

श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए

जब भी कृष्ण भगवान के मंदिर जाएं तो यह जरुर ध्यान रखें कि कृष्ण जी कि मूर्ति की पीठ के दर्शन ना करें। दरअसल पीठ के दर्शन न करने के संबंध में भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण की एक कथा प्रचलित है। कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण जरासंध से युद्ध कर रहे थे तब जरासंध का एक साथी असूर कालयवन भी भगवान से युद्ध करने आ पहुंचा। कालयवन श्रीकृष्ण के सामने पहुंचकर ललकारने लगा। तब श्रीकृष्ण वहां से भाग निकले। इस तरह रणभूमि से भागने के कारण ही उनका नाम रणछोड़ पड़ा।

जब श्रीकृष्ण भाग रहे थे तब कालयवन भी उनके पीछे-पीछे भागने लगा। इस तरह भगवान रणभूमि से भागे क्योंकि कालयवन के पिछले जन्मों के पुण्य बहुत अधिक थे और कृष्ण किसी को भी तब तक सजा नहीं देते जब कि पुण्य का बल शेष रहता है। कालयवन कृष्णा की पीठ देखते हुए भागने लगा और इसी तरह उसका अधर्म बढऩे लगा क्योंकि भगवान की पीठ पर अधर्म का वास होता है और उसके दर्शन करने से अधर्म बढ़ता है।

जब कालयवन के पुण्य का प्रभाव खत्म हो गया कृष्ण एक गुफा में चले गए। जहां मुचुकुंद नामक राजा निद्रासन में था। मुचुकुंद को देवराज इंद्र का वरदान था कि जो भी व्यक्ति राजा को निंद से जगाएगा और राजा की नजर पढ़ते ही वह भस्म हो जाएगा। कालयवन ने मुचुकुंद को कृष्ण समझकर उठा दिया और राजा की नजर पढ़ते ही राक्षस वहीं भस्म हो गया।

अत: भगवान श्री हरि की पीठ के दर्शन नहीं करने चाहिए क्योंकि इससे हमारे पुण्य कर्म का प्रभाव कम होता है और अधर्म बढ़ता है। कृष्णजी के हमेशा ही मुख की ओर से ही दर्शन करें। 

श्री कृष्ण की पीठ के दर्शन क्यों नहीं करने चाहिए

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श्री कृष्ण के महान रहस्य

श्री कृष्ण के महान रहस्य

1. श्रीकृष्ण का रंग

जनश्रुति अनुसार कुछ लोग श्रीकृष्ण की त्वचा का रंग काला और ज्यादातर लोग श्याम रंग का मानते हैं। श्याम रंग अर्थात कुछ-कुछ काला और कुछ-कुछ नीला। मतलब काले जैसा नीला। जैसा सूर्यास्त के बाद जब दिन अस्त होने वाला रहता है तो आसमान का रंग काले जैसा नीला हो जाता है।

जनश्रुति अनुसार उनका रंग न तो काला और न ही नीला था। यह भी कि उनका रंग काला मिश्रित ‍नीला भी नहीं था। उनकी त्वचा का रंग श्याम रंग भी नहीं था। दरअसल उनकी त्वचा का रंग मेघ श्यामल (Cloud Shyamal) था। अर्थात काला, नीला और सफेद मिश्रित रंग।

 
2. श्रीकृष्ण की गंध

प्रचलित जनश्रुति अनुसार माना जाता है कि उनके शरीर से मादक गंध निकलती रहती थी। इस गंध को वे अपने गुप्त अभियानों में छुपाने का उपक्रम करते थे। यही खूबी द्रौपदी में भी थी। द्रौपदी के शरीर से भी सुगंध निकलती रहती थी जो लोगों को आकर्षित करती थी। सभी इस सुगंध की दीशा में देखने लगते थे। इसीलिए अज्ञातवास के समय द्रौपदी को चंदन, उबटन और इत्रादि का कार्य किया जिसके चलते उनको सैरंध्री कहा जाने लगा था।

माना जाता है कि श्रीकृष्‍ण के शरीर से निकलने वाली गंधी गोपिकाचंदन और कुछ-कुछ रातरानी की सुगंध से मिलती जुलती थी। कुछ लोग इसे अष्टगंध भी कहते है |
 

3. श्रीकृष्ण के शरीर के गुण

कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण की देह कोमल अर्थात लड़कियों के समान मृदु थी लेकिन युद्ध के समय उनकी देह विस्तृत और कठोर हो जाती थी। जनश्रुति अनुसार ऐसा माना जाता है कि ऐसा इसलिए हो जाता था क्योंकि वे योग और कलारिपट्टू विद्या में पारंगत थे।
इसका मतलब यह कि श्रीकृष्ण अपनी देह को किसी भी प्रकार का बनाना जानते थे। इसीलिए स्त्रियों के समान दिखने वाला उनका कोमल शरीर युद्ध के समय अत्यंत ही कठोर दिखाई देने लगता था। यही गुण कर्ण और द्रौपदी के शरीर में भी था।


4. सदा जवान बने रहे श्रीकृष्ण

भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था। उनका बचपन गोकुल, वृंदावन, नंदगाव, बरसाना आदि जगहों पर बीता। द्वारिका को उन्होंने अपना निवास स्थान बनाया और सोमनाथ के पास स्थित प्रभास क्षेत्र में उन्होंने देह छोड़ दी। दरअसल भगवान कृष्ण इसी प्रभाव क्षेत्र में अपने कुल का नाश देखकर बहुत व्यथित हो गए थे। वे तभी से वहीं रहने लगे थे।
एक दिन वे एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे तभी किसी बहेलिये ने उनको हिरण समझकर तीर मार दिया। यह तीर उनके पैरों में जाकर लगा और तभी उन्होंने देह त्यागने का निर्णय ले लिया। एक दिन वे इसी प्रभाव क्षेत्र के वन में एक पीपल के वृक्ष के नीचे योगनिद्रा में लेटे थे, तभी ‘जरा’ नामक एक बहेलिए ने भूलवश उन्हें हिरण समझकर विषयुक्त बाण चला दिया, जो उनके पैर के तलुवे में जाकर लगा और भगवान श्रीकृष्ण ने इसी को बहाना बनाकर देह त्याग दी।
जनश्रुति अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने जब देहत्याग किया तब उनकी देह के केश न तो श्वेत थे और ना ही उनके शरीर पर किसी प्रकार से झुर्रियां पड़ी थी। अर्थात वे 119 वर्ष की उम्र में भी युवा जैसे ही थे।


5. कृष्ण की द्वारिका

भगवान कृष्ण ने गुजरात के समुद्री तट पर अपने पूर्वजों की भूमि पर एक भव्य नगर का निर्माण किया था। कुछ विद्वान कहते हैं कि उन्होंने पहले से उजाड़ पड़ी कुशस्थली को फिर से निर्मित करवाया था। माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण अंतिम वर्षों को छोड़कर कभी भी द्वारिका में 6 महीने से ज्यादा नहीं रहे।

6. कृष्ण की द्वारिका को किसने किया था नष्ट?

श्रीकृष्ण की इस नगरी को विश्‍वकर्मा और मयदानव ने मिलकर बनाया था। विश्वकर्मा देवताओं के और मयदानव असुरों के इंजीनियर थे। दोनों ही राम के काल में भी थे। इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका जल में डूबने से पहले नष्ट की गई थी। किसने नष्ट किया होगा द्वारिका को? यह सवाल अभी भी बना हुआ है। हालांकि समुद्र के भीतर द्वारिका के अवशेष ढूंढ लिए गए हैं। वहां उस समय के जो बर्तन मिले, हैं वो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के बताए जाते हैं।

 

7. ईसा मसीह पर श्रीकृष्ण और बुद्ध का प्रभाव

हालांकि यह अभी भी शोध का विषय है। फिर भी अब तक जीतने भी लोगों ने इस पर शोध किया उनका कहना यही है कि ईसा मसीह ने भारत का भ्रमण किया था और वे कश्मीर से लेकर जगन्नाथ मंदिर तक गए थे।
उन्होंने कश्मीर के एक बौद्ध मठ में रहकर ध्यान साधना की थी। यहीं पर उनकी समाधि भी है। शोधकर्ता मानते हैं कि श्रीकृष्ण का ईसा मसीह के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा।


8. मार्शल आर्ट के जन्मदाता थे श्रीकृष्ण

भारतीय परंपरा और जनश्रुति अनुसार भगवान श्रीकृष्‍ण ने ही मार्शल आर्ट का अविष्कार किया था। दरअसल पहले इसे कालारिपयट्टू (kalaripayattu) कहा जाता था। इस विद्या के माध्यम से ही उन्होंने चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था तब उनकी उम्र 16 वर्ष की थी। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था।
जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कालारिपयट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। हालांकि इसके बाद इस विद्या को अगस्त्य मुनि ने प्रचारित किया था।
इस विद्या के कारण ही ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी। श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली। आज भी यह विद्या केरल और कर्नाटक में प्रचलित है।

9. परशुरामजी ने दिया था सुदर्शन चक्र

श्रीकृष्ण के पास यूं तो कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। लेकिन सुदर्शन चक्र मिलने के बाद सभी ओर उनकी साख बढ़ गई थी।
शिवाजी सावंत की किताब ‘युगांधर अनुसार’ श्रीकृष्ण को भगवान परशुराम ने सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था।


10. शिव और कृष्ण का जीवाणु युद्ध

प्रचलित मान्यता अनुसार कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय ‘माहेश्वर ज्वर’ के विरुद्ध ‘वैष्णव ज्वर’ का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ लड़ा था। हालांकि यह शोध का विषय हो सकता है।
युद्ध का कारण : कृष्ण से प्रद्युम्न का और प्रद्युम्न से अनिरुद्ध का जन्म हुआ। प्रद्युम्न के पुत्र तथा कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध की पत्नी के रूप में उषा की ख्याति है। अनिरुद्ध की पत्नी उषा शोणितपुर के राजा वाणासुर की कन्या थी। अनिरुद्ध और उषा आपस में प्रेम करते थे। उषा ने अनिरुद्ध का हरण कर लिया था। वाणासुर को अनिरुद्ध-उषा का प्रेम पसंद नहीं था। उसने अनिरुद्ध को बंधक बना लिया था। वाणासुर को शिव का वरदान प्राप्त था। भगवान शिव को इसके कारण श्रीकृष्ण से युद्ध करना पड़ा था। अंत में देवताओं के समझाने के बाद यह युद्ध रुका था।

11. श्री कृष्ण के युद्ध हथियार

भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम ‘सारंग’ था। उनके खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजञ्य’ था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम ‘जैत्र’ दूसरे का नाम ‘गरुढ़ध्वज’ था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था।

12. कृष्ण की प्रेमिका और पत्नियां

कृष्ण के बारे में अक्सर यह कहां जाता है कि उनकी 16 हजार पटरानियां थी। लेकिन यह तथ्‍य गलत है। उनकी मात्र 8 पत्नियां थीं।
कृष्ण की जिन 16 हजार पटरानियों के बारे में कहा जाता है दरअसल वे सभी भौमासर जिसे नरकासुर भी कहते हैं उसके यहां बंधक बनाई गई महिलाएं थीं जिनको श्रीकृष्‍ण मुक्त कराया था। ये महिलाएं किसी की मां थी, किसी की बहिन तो किसी की पत्नियां थी जिनको भौमासुर अपहरण करके ले गया था।


13. मृत लोगों को जीवित कर दिया था श्रीकृष्ण ने

ऋषि सांदिपनी को जब गुरुदक्षिणा मांगने के लिए कहा गया तब गुरु ने कहा कि मेरे पुत्र को एक असुर उठा ले गया है आप उसे आपस ले आएं तो बड़ी कृपा होगी। श्रीकृष्ण ने गुरु के पुत्र को कई जगह ढूंढ और अंत में वे समुद्र के किनारे चले गए जहां से उन्हें पता चला कि असुर उसे समुद्र में ले गया है तो श्रीकृष्ण भी वहीं पहुंच गया। बाद में पता चला कि उसे तो यमराज ले गए हैं तब श्रीकृष्ण ने यमराज से गुरु के पुत्र को हासिल कर लिया और गुरु दक्षिणा पूर्ण की।

इस तरह अर्जुन की 4 पत्नियां थीं- द्रौपदी, सुभद्रा, उलूपी और चित्रांगदा। द्रौपदी से श्रुतकर्मा और सुभद्रा से अभिमन्यु, उलूपी से इरावत, चित्रांगदा से वभ्रुवाहन नामक पुत्रों की प्राप्ति हुई।
अभिमन्यु का विवाह महाराज विराट की पुत्री उत्तरा से हुआ। महाभारत युद्ध में अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हुए। जब महाभारत का युद्ध चल रहा था, तब उत्तरा गर्भवती थी। उसके पेट में अभिमन्यु का पुत्र पल रहा था। द्रोण पुत्र अश्वत्थामा ने यह संकल्प लेकर ब्रह्मास्त्र छोड़ा था कि पांडवों का वंश नष्ट हो जाए।

द्रोण पुत्र अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र प्रहार से उत्तरा ने मृत शिशु को जन्म दिया था किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु-उत्तरा पुत्र को ब्रह्मास्त्र के प्रयोग के बाद भी फिर से जीवित कर दिया। यही बालक आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ। परीक्षित के प्रतापी पुत्र हुए जन्मेजय।
ऐसे कई उदाहरण हैं जबकि भगवान कृष्ण ने लोगों को फिर से जीवित कर दिया। भीम पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की गर्दन कटी होने के बावजूद श्रीकृष्ण ने उसे महाभारत युद्ध की समाप्ति तक जीवित रखा।


13. श्रीकृष्ण का दिल

हिन्दू धर्म के बेहद पवित्र स्थल और चार धामों में से एक जगन्नाथ पुरी की धरती को भगवान विष्णु का स्थल माना जाता है। जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी एक बेहद रहस्यमय कहानी प्रचलित है।

स्थानीय मान्यताओं अनुसार कहते हैं कि इस मूर्ति के भीतर भगवान कृष्ण का दिल का एक पिंड रखा हुआ है जिसमें ब्रह्मा विराजमान हैं। दरअसल, जनश्रुति के अनुसार जब श्रीकृष्ण की मृत्यु हुई तब पांडवों ने उनके शरीर का दाह-संस्कार कर दिया लेकिन कृष्ण का दिल (पिंड) जलता ही रहा। ईश्वर के आदेशानुसार पिंड को पांडवों ने जल में प्रवाहित कर दिया। उस पिंड ने लट्ठे का रूप ले लिया। राजा इन्द्रद्युम्न, जो कि भगवान जगन्नाथ के भक्त थे, को यह लट्ठा मिला तो उन्होंने इसे जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित कर दिया। उस दिन से लेकर आज तक वह लट्ठा भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर है। हर 12 वर्ष के अंतराल के बाद जगन्नाथ की मूर्ति बदलती है, लेकिन यह लट्ठा उसी में रहता है। हालांकि यह शोध का विषय हो सकता है।
 

14. नहीं हुआ था यदुवंश का नाश

महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए शाप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा।

शाप के चलते श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रभास क्षेत्र में आ गए। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत लगभग सभी यदुवंशी मारे गए थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गए थे।


15. वानर राज बाली ही था जरा बहेलिया

पौराणिक मान्यताओं अनुसार प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

 

श्री कृष्ण के महान रहस्य

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श्री कृष्ण की 10 बड़ी लड़ाईयां

श्री कृष्ण की 10 बड़ी लड़ाईयां

भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कई युद्धों का संचालन किया। कहना चाहिए कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में युद्ध ही युद्ध किए। श्रीकृष्ण की जो रसिक बिहारी की छवि ‍निर्मित हुई, वह मध्यकाल के भक्त कवियों द्वारा निर्मित की गई है, क्योंकि वे अपने आराध्य को हिंसक मानने के लिए तैयार नहीं थे।
मध्यकाल के भक्तों ने श्रीकृष्ण के संबंध में कई मनगढ़ंत बातों का प्रचार किया और महाभारत के कृष्ण की छवि को पूर्णत: बदलकर रख दिया। उन्होंने कृष्ण के साथ राधा का नाम जोड़कर दोनों को प्रेमी और प्रेमिका बना दिया। उनका यह रूप आज भी जनमानस में व्यापक रूप से प्रचलित है।
खैर, हालांकि भगवान कृष्ण ने यूं तो कई असुरों का वध किया जिनमें पूतना, शकटासुर, कालिया, यमुलार्जन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ठ आदि। लेकिन हम आपको बताएंगे कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में कौन-कौन से युद्ध लड़े या उनका संचालन किया। उनमें से भी प्रमुख कौन से हैं। आओ जानते हैं, श्रीकृष्ण के प्रमुख 10 युद्धों के बारे में जानकारी…

युद्ध के बारे में जानने से पहले जानते हैं श्रीकृष्ण की शक्ति के स्रोत :

श्रीकृष्ण की शक्ति के स्रोत : भगवान श्रीकृष्ण 64 कलाओं में दक्ष थे। एक ओर वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे तो दूसरी ओर वे द्वंद्व युद्ध में भी माहिर थे। इसके अलावा उनके पास कई अस्त्र और शस्त्र थे। उनके धनुष का नाम ‘सारंग’ था। उनके खड्ग का नाम ‘नंदक’, गदा का नाम ‘कौमौदकी’ और शंख का नाम ‘पांचजञ्य’ था, जो गुलाबी रंग का था। श्रीकृष्ण के पास जो रथ था उसका नाम ‘जैत्र’ दूसरे का नाम ‘गरुढ़ध्वज’ था। उनके सारथी का नाम दारुक था और उनके अश्वों का नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक था।

श्रीकृष्ण के पास कई प्रकार के दिव्यास्त्र थे। भगवान परशुराम ने उनको सुदर्शन चक्र प्रदान किया था, तो दूसरी ओर वे पाशुपतास्त्र चलाना भी जानते थे। पाशुपतास्त्र शिव के बाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के पास ही था। इसके अलावा उनके पास प्रस्वपास्त्र भी था, जो शिव, वसुगण, भीष्म के पास ही था।

1. कंस से युद्ध

कंस से युद्ध तो श्रीकृष्‍ण ने जन्म लेते ही शुरू कर दिया था। कंस के कारण ही तो श्रीकृष्ण को ताड़का, पूतना, शकटासुर आदि का बचपन में ही वध करना पड़ा। भगवान कृष्ण का मामा था कंस। वह अपने पिता उग्रसेन को राजपद से हटाकर स्वयं शूरसेन जनपद का राजा बन बैठा था। कंस बेहद क्रूर था। कंस अपने पूर्व जन्म में ‘कालनेमि’ नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु अवतार श्रीराम ने मारा था।

कंस के काका शूरसेन का मथुरा पर राज था और शूरसेन के पुत्र वसुदेव का विवाह कंस की बहन देवकी से हुआ था। कंस अपनी चचेरी बहन देवकी से बहुत स्नेह रखता था, लेकिन एक दिन वह देवकी के साथ रथ पर कहीं जा रहा था, तभी आकाशवाणी सुनाई पड़ी- ‘जिसे तू चाहता है, उस देवकी का 8वां बालक तुझे मार डालेगा।’ बस इसी भविष्यवाणी ने कंस का दिमाग घुमा दिया।

कंस ने अपनी बहन और बहनोई वसुदेव को जेल में डाल दिया। बाद में कंस ने 1-1 करके देवकी के 6 बेटों को जन्म लेते ही मार डाला। 7वें गर्भ में श्रीशेष (अनंत) ने प्रवेश किया था। भगवान विष्णु ने श्रीशेष को बचाने के लिए योगमाया से देवकी का गर्भ ब्रजनिवासिनी वसुदेव की पत्नी रोहिणी के उदर में रखवा दिया। तदनंतर 8वें बेटे की बारी में श्रीहरि ने स्वयं देवकी के उदर से पूर्णावतार लिया। कृष्ण के जन्म लेते ही माया के प्रभाव से सभी संतरी सो गए और जेल के दरवाजे अपने आप खुलते गए। वसुदेव मथुरा की जेल से शिशु कृष्ण को लेकर नंद के घर पहुंच गए।

बाद में कंस को जब पता चला तो उसके मंत्रियों ने अपने प्रदेश के सभी नवजात शिशुओं को मारना प्रारंभ कर दिया। बाद में उसे कृष्ण के नंद के घर होने के पता चला तो उसने अनेक आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों से कृष्ण को मरवाना चाहा, पर सभी कृष्ण तथा बलराम के हाथों मारे गए।

तब योजना अनुसार कंस ने एक समारोह के अवसर पर कृष्ण तथा बलराम को आमंत्रित किया। वह वहीं पर कृष्ण को मारना चाहता था, किंतु कृष्ण ने उस समारोह में कंस को बालों से पकड़कर उसकी गद्दी से खींचकर उसे भूमि पर पटक दिया और इसके बाद उसका वध कर दिया। कंस को मारने के बाद देवकी तथा वसुदेव को मुक्त किया और उन्होंने माता-पिता के चरणों में वंदना की।

 

2. जरासंध से युद्ध

कंस वध के बाद जरासंध से तो कृष्ण ने कई बार युद्ध किया। जरासंध कंस का ससुर था इसलिए उसने श्रीकृष्ण को मारने के लिए मथुरा पर कई बार आक्रमण किया। जरासंध मगध का अत्यंत क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण के अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, कश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है।

जरासंध ने पूरे दल-बल के साथ शूरसेन जनपद (मथुरा) पर एक बार नहीं, कई बार चढ़ाई की, लेकिन हर बार वह असफल रहा। पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

जरासंध के कई साथी राजा थे- कामरूप का राजा दंतवक, चेदिराज शिशुपाल, कलिंगपति पौंड्र, भीष्मक पुत्र रुक्मी, काध अंशुमान तथा अंग, बंग, कोशल, दषार्ण, भद्र, त्रिगर्त आदि के राजा थे। इनके अतिरिक्त शाल्वराज, पवनदेश का राजा भगदत्त, सौवीरराज, गांधार का राजा सुबल, नग्नजित का राजा मीर, दरद देश का राजा गोभर्द आदि। महाभारत युद्ध से पहले भीम ने जरासंध के शरीर को 2 हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था।


3. कालयवन से युद्ध

पुराणों के अनुसार जरासंध ने 18 बार मथुरा पर चढ़ाई की। 17 बार वह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

कालयवन की सेना ने मथुरा को घेर लिया। उसने मथुरा नरेश के नाम संदेश भेजा और युद्ध के लिए एक दिन का समय दिया। श्रीकृष्ण ने उत्तर में भेजा कि युद्ध केवल कृष्ण और कालयवन में हो, सेना को व्यर्थ क्यूं लड़ाएं? कालयवन ने स्वीकार कर लिया। ऐसा कहा जाता है कि इसी युद्ध के बाद श्रीकृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ा।

कृष्ण और कालयवन का युद्ध हुआ और कृष्‍ण रण की भूमि छोड़कर भागने लगे, तो कालयवन भी उनके पीछे भागा। भागते-भागते कृष्ण एक गुफा में चले गए। कालयवन भी वहीं घुस गया। गुफा में कालयवन ने एक दूसरे मनुष्य को सोते हुए देखा। कालयवन ने उसे कृष्ण समझकर कसकर लात मार दी और वह मनुष्य उठ पड़ा।

उसने जैसे ही आंखें खोली और इधर-उधर देखने लगे, तब सामने उसे कालयवन दिखाई दिया। कालयवन उसके देखने से तत्काल ही जलकर भस्म हो गया। कालयवन को जो पुरुष गुफा में सोए मिले, वे इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मांधाता के पुत्र राजा मुचुकुन्द थे, जो तपस्वी और प्रतापी थे।

4. कृष्ण और अर्जुन का युद्ध

कहते हैं कि एक बार श्रीकृष्ण और अर्जुन में द्वंद्व युद्ध हुआ था। यह श्रीकृष्ण के जीवन का भयंकर द्वंद्व युद्ध था। माना जाता है कि यह युद्ध कृष्ण की बहन सुभद्रा की प्रतिज्ञा के कारण हुआ था।

अंत में इस युद्ध में दोनों ने अपने-अपने सबसे विनाशक शस्त्र क्रमशः सुदर्शन चक्र और पाशुपतास्त्र निकाल लिए थे, लेकिन देवताओं के हस्तक्षेप करने से ही वे दोनों शांत हुए थे।

5. शिव और कृष्ण का जीवाणु युद्ध

माना जाता है कि कृष्ण ने असम में बाणासुर और भगवान शिव से युद्ध के समय ‘माहेश्वर ज्वर’ के विरुद्ध ‘वैष्णव ज्वर’ का प्रयोग कर विश्व का प्रथम ‘जीवाणु युद्ध’ लड़ा था।

बलि के 10 पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र का नाम बाण था। बाण ने घोर तपस्या के फलस्वरूप शिव से अनेक दुर्लभ वर प्राप्त किए थे। वह शोणितपुर पर राज्य करता था। बाणासुर को भगवान शिव ने अपना पुत्र माना था इसलिए उन्होंने उसकी जान बचाने के लिए श्रीकृष्ण से युद्ध किया था। बाणासुर अहंकारी, महापापी और अधर्मी था।

कहते हैं कि इस युद्ध में श्रीकृष्ण ने शिव पर जृंभास्त्र का प्रयोग किया था। इस युद्ध में बाणासुर की जान बचाने की लिए स्वयं मां पार्वती जब सामने आकर खड़ी हो गईं, तब श्रीकृष्ण ने बाणासुर को अभयदान दिया।


6. नरकासुर से युद्ध

नरकासुर को भौमासुर भी कहा जाता है। कृष्ण अपनी आठों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक द्वारिका में रह रहे थे। एक दिन स्वर्गलोक के राजा देवराज इंद्र ने आकर उनसे प्रार्थना की, ‘हे कृष्ण! प्रागज्योतिषपुर के दैत्यराज भौमासुर के अत्याचार से देवतागण त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। क्रूर भौमासुर ने वरुण का छत्र, अदिति के कुंडल और देवताओं की मणि छीन ली है और वह त्रिलोक विजयी हो गया है।’

इंद्र ने कहा, ‘भौमासुर ने पृथ्वी के कई राजाओं और आमजनों की अति सुन्दर कन्याओं का हरण कर उन्हें अपने यहां बंदीगृह में डाल रखा है। कृपया आप हमें बचाइए प्रभु।’

इंद्र की प्रार्थना स्वीकार कर के श्रीकृष्ण अपनी प्रिय पत्नी सत्यभामा को साथ लेकर गरूड़ पर सवार हो प्रागज्योतिषपुर पहुंचे। वहां पहुंचकर भगवान कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा की सहायता से सबसे पहले मुर दैत्य सहित मुर के 6 पुत्रों- ताम्र, अंतरिक्ष, श्रवण, विभावसु, नभश्वान और अरुण का संहार किया।

मुर दैत्य का वध हो जाने का समाचार सुन भौमासुर अपने अनेक सेनापतियों और दैत्यों की सेना को साथ लेकर युद्ध के लिए निकला। भौमासुर को स्त्री के हाथों मरने का श्राप था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को सारथी बनाया और घोर युद्ध के बाद अंत में कृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध कर डाला।

 

7. महाभारत युद्ध

महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व हुआ था। तब श्रीकृष्ण 55 या 56 वर्ष के थे। हालांकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उनकी उम्र 83 वर्ष की थी। महाभारत युद्ध के 36 वर्ष बाद उन्होंने देह त्याग दी थी। इसका मतलब 119 वर्ष की आयु में उन्होंने देहत्याग किया था। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईपू में हुआ। श्रीकृष्ण ने यह युद्ध नहीं लड़ा था लेकिन उन्होंने इस युद्ध का संचालन जरूर किया था।

माना जाता है कि महाभारत युद्ध में एकमात्र जीवित बचा कौरव युयुत्सु था और 24,165 कौरव सैनिक लापता हो गए थे। लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, ‍जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। कलियुग के आरंभ होने से 6 माह पूर्व मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत का युद्ध का आरंभ हुआ था, जो 18 दिनों तक चला था। इस युद्ध में ही श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था।


8. चाणूर और मुष्टिक से युद्ध

श्रीकृष्‍ण ने 16 वर्ष की उम्र में चाणूर और मुष्टिक जैसे मल्लों का वध किया था। मथुरा में दुष्ट रजक के सिर को हथेली के प्रहार से काट दिया था। कहते हैं कि यह मार्शल आर्ट की विद्या थी। पूर्व में इस विद्या का नाम कलारिपट्टू था।

जनश्रुतियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने मार्शल आर्ट का विकास ब्रज क्षेत्र के वनों में किया था। डांडिया रास उसी का एक नृत्य रूप है। कलारिपट्टू विद्या के प्रथम आचार्य श्रीकृष्ण को ही माना जाता है। इसी कारण ‘नारायणी सेना’ भारत की सबसे भयंकर प्रहारक सेना बन गई थी।

श्रीकृष्ण ने ही कलारिपट्टू की नींव रखी, जो बाद में बोधिधर्मन से होते हुए आधुनिक मार्शल आर्ट में विकसित हुई। बोधिधर्मन के कारण ही यह विद्या चीन, जापान आदि बौद्ध राष्ट्रों में खूब फली-फूली।


9. कृष्ण-जाम्बवंत युद्ध

भगवान श्रीकृष्ण का जाम्बवंत से द्वंद्व युद्ध हुआ था। जाम्बवंत रामायण काल में थे और उनको अजर-अमर माना जाता है। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम जाम्बवती था। जाम्बवंतजी से भगवान श्रीकृष्ण को स्यमंतक मणि के लिए युद्ध करना पड़ा था। उन्होंने मणि के लिए नहीं, बल्कि खुद पर लगे मणि चोरी के आरोप को असिद्ध करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा था। दरअसल, यह मणि भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी सत्यभामा के पिता सत्राजित के पास थी और उन्हें यह मणि भगवान सूर्य ने दी थी।

सत्राजित ने यह मणि अपने देवघर में रखी थी। वहां से वह मणि पहनकर उनका भाई प्रसेनजित आखेट के लिए चला गया। जंगल में उसे और उसके घोड़े को एक सिंह ने मार दिया और मणि अपने पास रख ली। सिंह के पास मणि देखकर जाम्बवंत ने सिंह को मारकर मणि उससे ले ली और उस मणि को लेकर वे अपनी गुफा में चले गए, जहां उन्होंने इसको खिलौने के रूप में अपने पुत्र को दे दी। इधर सत्राजित ने श्रीकृष्ण पर आरोप लगा दिया कि यह मणि उन्होंने चुराई है।

तब श्रीकृष्ण को यह मणि हासिल करने के लिए जाम्बवंत से युद्ध करना पड़ा। बाद में जाम्बवंत जब युद्ध में हारने लगे तब उन्होंने अपने प्रभु श्रीराम को पुकारा और उनकी पुकार सुनकर श्रीकृष्ण को अपने राम स्वरूप में आना पड़ा। तब जाम्बवंत ने समर्पण कर अपनी भूल स्वीकारी और उन्होंने मणि भी दी और श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि आप मेरी पुत्री जाम्बवती से विवाह करें।


10. पौंड्रक-कृष्ण युद्ध

चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। इसलिए वह खुद को वासुदेव कहता था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी के तट पर किरात, वंग एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला है। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है।

एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।’

युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं वह गरूड़ पर आरूढ़ था। नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपट रूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।

 

श्री कृष्ण की 10 बड़ी लड़ाईयां

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Saturday, December 26, 2015

।।जय श्री राधे कृष्ण।।
श्यामसुन्दर मोर पंख क्यों लगाते है

श्यामसुन्दर मोर पंख क्यों लगाते है?

सारे देवताओं में सबसे ज्यादा श्रृंगार प्रिय है भगवान कृष्ण। उनके भक्त हमेशा उन्हें नए कपड़ों और आभूषणों से लादे रखते हैं। कृष्ण गृहस्थी और संसार के देवता हैं कई बार मन में सवाल उठता है कि तरह-तरह के आभूषण पहनने वाले कृष्ण मोर-मुकुट क्यों धारण करते हैं? उनके मुकुट में हमेशा मोर का ही पंख क्यों लगाया जाता है?
इसका पहला कारण तो यह है कि मोर ही अकेला एक ऐसा प्राणी है, जो ब्रह्मचर्य को धारण करता है, जब मोर प्रसन्न होता है तो वह अपने पंखो को फैला कर नाचता है. और जब नाचते-नाचते मस्त हो जाता है, तो उसकी आँखों से आँसू गिरते है और मोरनी इन आँसू को पीती है और इससे ही गर्भ धारण करती है,मोर में कही भी वासना का लेश भी नही है,और जिसके जीवन में वासना नहीं, भगवान उसे अपने शीश पर धारण कर लेते है.
वास्तव में श्री कृष्ण का मोर मुकुट कई बातों का प्रतिनिधित्व करता है, यह कई तरह के संकेत हमारे जीवन में लाता है.अगर इसे ठीक से समझा जाए तो कृष्ण का मोर-मुकुट ही हमें जीवन की कई सच्चाइयों से अवगत कराता है. दरअसल मोर का पंख अपनी सुंदरता के कारण प्रसिद्ध है. मोर मुकुट के जरिए श्रीकृष्ण यह संदेश देते हैं कि जीवन में भी वैसे ही रंग है जैसे मोर के पंख में है. कभी बहुत गहरे रंग होते हैं यानी दुख और मुसीबत होती है तो कभी एकदम हल्के रंग यानी सुख और समृद्धि भी होती है.जीवन से जो मिले उसे सिर से लगा लें यानी सहर्ष स्वीकार कर लें.
तीसरा कारण भी है, दरअसल इस मोर-मुकुट से श्रीकृष्ण शत्रु और मित्र के प्रति समभाव का संदेश भी देते हैं. बलराम जो कि शेषनाग के अवतार माने जाते हैं, वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई हैं. वहीं मोर जो नागों का शत्रु है वह भी श्रीकृष्ण के सिर पर विराजित है. यही विरोधाभास ही श्रीकृष्ण के भगवान होने का प्रमाण भी है कि वे शत्रु और मित्र के प्रति समभाव रखते हैं जय श्री कृष्ण
ऐसा भी कहते है कि राधा रानी के महलों में मोर थे और वे उन्हें नचाया करती थी जव वे ताल ठोकती तो मोर भी मस्त होकर राधा रानी जी के इशारों पर नाचने लग जाती एक बार मोर मस्त होकर नाच रही थी कृष्ण भी वहाँ आ गए और नाचने लगे तभी मोर का एक पंख गिरा तो श्यामसुन्दर ने झट उसे उठाया और राधा रानी जी का कृपा प्रसाद समझकर अपने शीश पर धारण कर लिया।

श्यामसुन्दर मोर पंख क्यों लगाते है

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Monday, December 21, 2015

आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक

आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक


माथे पर तिलक लगाने का क्या महत्व है?

शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है
तिलक हमारे शरीर को एक मंदिर की भाँति अंकित करता है, शुद्ध करता है और बुरे प्रभावों से हमारी रक्षा भी करता है। इस तिलक को हम स्वयं देखें या कोई और देखे तो उसे स्वतः ही श्री कृष्ण का स्मरण हो आता है। गोपी चन्दन तिलक के माहात्म्य का वर्णन विस्तार रूप में गर्ग-संहिता के छठवें स्कंध, पन्द्रहवें अध्याय में किया गया है। उसके अतिरिक्त कई अन्य शास्त्रों में भी इसके माहात्म्य का उल्लेख मिलता है।

कुछ इस प्रकार हैं:


अगर कोई वैष्णव जो उर्धव-पुन्ड्र लगा कर किसी के घर भोजन करता है, तो उस घर के २० पीढ़ियों को मैं (परम पुरुषोत्तम भगवान) घोर नरकों से निकाल लेता हूँ। – (हरी-भक्तिविलास ४.२०३, ब्रह्माण्ड पुराण से उद्धृत)

हे पक्षीराज! (गरुड़) जिसके माथे पर गोपी-चन्दन का तिलक अंकित होता है, उसे कोई गृह-नक्षत्र, यक्ष, भूत-पिशाच, सर्प आदि हानि नहीं पहुंचा सकते।       – (हरी-भक्ति विलास ४.२३८, गरुड़ पुराण से उद्धृत)

जिन भक्तों के गले में तुलसी या कमल की कंठी-माला हो, कन्धों पर शंख-चक्र अंकित हों, और तिलक शरीर के बारह स्थानों पर चिन्हित हो, वे समस्त ब्रह्माण्ड को पवित्र करते हैं । – पद्म पुराण

तिलक कृष्ण के प्रति हमारे समर्पण का एक बाह्य प्रतीक है। इसका आकार और उपयोग की हुयी सामग्री,हर सम्प्रदाय या आत्म-समर्पण की प्रक्रिया पर निर्भर करती है।

पद्म पुराण के उत्तर खंड में भगवान शिव, पार्वती जी से कहते हैं कि वैष्णवों के “V” तिलक के बीच में जो स्थान है उसमे लक्ष्मी एवं नारायण का वास है। इसलिए जो भी शरीर इन तिलकों से सजा होगा उसे श्री विष्णु  के मंदिर के समान समझना चाहिए ।
पद्म पुराण में एक और स्थान पर:
वाम्-पार्श्वे स्थितो ब्रह्मा
दक्षिणे च सदाशिवः
मध्ये विष्णुम् विजनियात
तस्मान् मध्यम न लेपयेत्
तिलक के बायीं ओर ब्रह्मा जी विराजमान हैं, दाहिनी ओर सदाशिव परन्तु सबको यह ज्ञात होना चाहिए कि मध्य में श्री विष्णु का स्थान है। इसलिए मध्य भाग में कुछ लेपना नहीं चाहिए।

बायीं हथेली पर थोड़ा सा जल लेकर उस पर गोपी-चन्दन को रगड़ें। तिलक बनाते समय पद्म पुराण में वर्णित निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें:

ललाटे केशवं ध्यायेन
नारायणम् अथोदरे
वक्ष-स्थले माधवम् तु 
गोविन्दम कंठ-कुपके 
विष्णुम् च दक्षिणे कुक्षौ 
बहौ च मधुसूदनम् 
त्रिविक्रमम् कन्धरे तु 
वामनम् वाम्-पार्श्वके 
श्रीधरम वाम्-बहौ तु 
ऋषिकेशम् च कंधरे 
पृष्ठे-तु पद्मनाभम च 
कत्यम् दमोदरम् न्यसेत् 
तत प्रक्षालन-तोयं तु 
वसुदेवेति मूर्धनि

गौड़ीय संप्रदाय में तिलक सामन्यतया गोपी-चन्दन से ही किया जाता है। कुछ भक्त वृन्दावन की रज से भी तिलक करते हैं। यह तिलक मूलतः मध्व तिलक के समान ही है। परन्तु इसमें दो अंतर पाये जाते हैं । श्री चैतन्य महाप्रभु ने कलियुग में नाम-संकीर्तन यज्ञ को यज्ञ-कुण्ड में होम से अधिक प्रधानता दी, इस कारण तिलक में भी बीच की काली रेखा नहीं लगायी जाती। दूसरा अंतर है भगवान श्री कृष्ण को समर्पण की प्रक्रिया। गौड़ीय संप्रदाय में सदैव श्रीमती राधारानी की प्रत्यक्ष सेवा से अधिक, एक सेवक भाव में परोक्ष रूप से सेवा को महत्व दिया जाता है । इस दास भाव को इंगित करने के लिए मध्व संप्रदाय जैसा लाल बिंदु न लगाकर भगवान के चरणों में तुलसी आकार बनाकर तुलसी महारानी की भावना को दर्शाया जाता है, ताकि उनकी कृपा प्राप्त कर हम भी श्री श्री राधा-कृष्ण की शुद्ध भक्ति विकसित कर सकें ।
किसी भी स्थिति में, तिलक का परम उद्देश्य अपने आप को पवित्र और भगवान के मंदिर के रूप में शरीर को चिन्हित करने के लिए है । शास्त्र विस्तार से यह निर्दिष्ट नहीं करते कि तिलक किस ढंग से किये जाने चाहिए। यह अधिकतर आचार्यों द्वारा शास्त्रों में वर्णित सामान्य प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए बनायीं गयी हैं ।

माथे पर – ॐ केशवाय नमः
नाभि के ऊपर – ॐ नारायणाय नमः
वक्ष-स्थल – ॐ माधवाय नमः
कंठ – ॐ गोविन्दाय नमः
उदर के दाहिनी ओर – ॐ विष्णवे नमः
दाहिनी भुजा – ॐ मधुसूदनाय नमः
दाहिना कन्धा – ॐ त्रिविक्रमाय नमः
उदर के बायीं ओर – ॐ वामनाय नमः
बायीं भुजा – ॐ श्रीधराय नमः
बायां कन्धा – ॐ ऋषिकेशाय नमः
पीठ का ऊपरी भाग – ॐ पद्मनाभाय नमः
पीठ का निचला भाग – ॐ दामोदराय नमः
अंत में जो भी गोपी-चन्दन बचे उसे ॐ वासुदेवाय नमः का उच्चारण करते हुए शिखा में पोंछ लेना चाहिए।

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Thursday, December 17, 2015

श्री राधानाम 1008 माला

श्री राधानाम 1008 माला

★राधे राधे★
राधा रानी की जय महारानी की जय--
बोलो बरसाने वारी की जय जय जय--
राधा रानी की जय महारानी की जय---
श्री राधा-- राधे राधे🙏💞
श्री राधिका-- राधे राधे🙏💞
श्री कृष्णवल्लभा -राधे राधे🙏💞
श्रीकृष्णसंयुत्ता -राधे राधे🙏💞
श्री वृंदावनेश्वरी -राधे राधे🙏💞
श्री कृष्णप्रिया -राधे राधे,🙏💞
श्री मदनमोहिनी -राधे राधे🙏💞
श्री कृष्णकांता -राधे राधे🙏💞 
कृष्णानंदप्रदायिनी -राधे राधे🙏💞
श्री यशस्वनि- राधे राधे🙏💞
श्री यशोगम्या- राधे राधे🙏💞
यशोदानंदवल्लभा -राधे राधे🙏💞
दामोदरप्रिया- राधे राधे🙏💞
श्री गोपी- राधे राधे🙏💞
गोपानंदकरी -राधे राधे🙏💞
श्रीकृष्णांङवासिनी -राधे राधे🙏💞
श्री ह्रदया -राधे राधे🙏💞
श्री हरिकांता- राधे राधे🙏💞
श्री हरिप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्री प्रधानगोपिका -राधे राधे🙏💞
श्री गोपकन्या- राधे राधे🙏💞
त्रिलोक्यसुंदरी- राधे राधे🙏💞
वृंदावनविहारिणी- राधे राधे🙏💞
विकसितमुखाम्बुजा -राधे राधे🙏💞
गोकुलानंदकर्त्री -राधे राधे🙏💞
गोकुलानंददायिनी -राधे राधे🙏💞
श्रीगतिप्रदा -राधे राधे🙏💞
श्री गीतगम्या- राधे राधे🙏💞
गमनागमनप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्री विष्णुप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्रीविष्णुकांता- राधे राधे🙏💞
विष्णुरंकनिवासिनी- राधे राधे🙏💞
यशोदानंदपत्नी -राधे राधे🙏💞
यशोदानंदगेहिनी -राधे राधे🙏💞
, कामारिकांता -राधे राधे🙏💞
श्री कामेषी- राधे राधे🙏💞
कामलालसविग्रह -राधे राधे🙏💞
श्री जयप्रदा -राधे राधे🙏💞
श्री जया- राधे राधे🙏💞
श्री जीवा- राधे राधे🙏💞
जीवनानंदप्रदायिनी- राधे राधे🙏💞
नंदनंदनपत्नी -राधे राधे🙏💞
वृषभानुसुता- राधे राधे🙏💞
श्री शिवा- राधे राधे🙏💞
श्री गणाध्याक्षा -राधे राधे🙏💞
श्री गवाध्याक्षा -राधे राधे, 
गवारनुत्तमागति -राधे राधे🙏💞
श्री कांचनाभा -राधे राधे🙏💞
श्री हेमगात्रा- राधे राधे🙏💞
कांचनांगदधारिणी -राधे राधे🙏💞
श्री अशोका - राधे राधे🙏💞
श्री शोकरहिता -राधे राधे🙏💞
श्री विशोका- राधे राधे ,
श्री शोकनाशिनी- राधे राधे🙏💞
श्री गायत्री- राधे राधे,श्री वेदमाता-राधे राधे🙏💞
🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞 🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞
2..................
★ मेरी प्यारी को नाम श्री राधे--★
🙏💞🙏💞🙏💞
कृष्ण प्यारी को नाम श्री राधे 🙏💞
हो श्री राधे श्री राधे 🙏💞
हो नंद वारी को नाम श्री राधे🙏💞
श्री वेदातीता- राधे राधे 🙏💞
श्री विदुत्तमा- राधे राधे 🙏💞
नीतिशास्त्रप्रिया- राधे राधे 🙏💞
श्री नीति -राधे राधे 🙏💞
श्री गति -राधे राधे🙏💞
श्री मति- राधे राधे🙏💞
श्री अभिष्टदा -राधे राधे🙏💞
श्री वेदप्रिया- राधे राधे🙏💞
श्रीवेदगर्भा- राधे राधे🙏💞
वेदमार्गप्रवर्धनी- राधे राधे🙏💞
श्री वेदगम्या- राधे राधे🙏💞
श्री वेदपरा -राधे राधे🙏💞
विचित्रकन्नकोज
्जवला -राधे राधे🙏💞
उज्जवलप्रदा -राधे राधे🙏💞
श्री नित्या -राधे राधे🙏💞
उज्जवलगात्रिका- राधे राधे🙏💞
श्री नंदप्रिया -राधे राधे🙏💞
नन्दसुताराध्या -राधे राध🙏💞
आनंदप्रदा- राधे राधे🙏💞
श्री शुभा- राधे राधे🙏💞
श्री शुभांगी -राधे राधे🙏💞
श्री विमलांगी -राधे राधे🙏💞
श्री विलासिनी- राधे राधे🙏💞
श्री अपराजिता -राधे राधे🙏💞
श्री जननी- राधे राधे🙏💞
श्री जन्मशून्या- राधे राधे🙏💞
जन्ममृत्युजरापहा - राधे राधे🙏💞
श्री गतिमतांगति -राधे राधे🙏💞
श्री धात्री- राधे राधे🙏💞
धात्रयानंदप्रदायिनी -राधे राधे🙏💞
जगन्नाथप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्री शैलवासिनी- राधे राधे🙏💞
श्री हेमसुंदरी- राधे राधे🙏💞
श्री किशोरी -राधे राधे🙏💞
श्री कमला- राधे राधे🙏💞 
श्री पद्मा - राधे राधे🙏💞
श्री पद्महस्ता -राधे राधे🙏💞
श्री पयोददा -राधे राधे🙏💞
श्री पयस्वनी- राधे राधे🙏💞
श्री पयोदात्री -राधे राधे🙏💞
श्री पवित्रा- राधे राधे🙏💞
श्री सर्वमंङगला- राधे राधे🙏💞
महाजीवप्रदा- राधे राधे🙏💞
श्री कृष्णकांता -राधे राधे🙏💞
श्रीकमलसूंदरी- राधे राधे🙏💞
श्री विचित्रवासिनी -राधे राध🙏💞
,श्री चित्रवासिनी -राधे राधे🙏💞
श्री चित्ररुपिणी -राधे राधे🙏💞
,श्री निर्गुणा- राधे राधे🙏💞
सुकुलिना -राधे राधे🙏💞
श्री निष्कुलीना -राधे राधे🙏💞
श्री निराकुला- राधे राधे🙏💞
गोकुलंतरगेहा- राधे राधे🙏💞
योगानंदकरी- राधे राधे🙏💞
श्री वेणुवाद्या- राधे राधे🙏💞
श्री वेणुरति -राधे राधे🙏💞
🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞 🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞🙏💞
3...............
🙏💞🙏💞🙏💞
★हो मन भुल मत जाईयो राधा रानी के चरण--
हो राधा रानी के चरण श्यामा प्यारी के चरण--
हो मन भुल मत जाईयो राधा रानी के चरण--
मेरे मन भुल मत जाईयो राधा रानी के चरण--★
🙏💞🙏💞🙏💞
वेणुवाद्यपरायणा -राधे राधे🙏💞
गोपालस्यप्रिया - राधे राधे🙏💞
श्री सौम्यरुपा- राधे राधे🙏💞
सौम्यकुलोद्वहा- राधे राधे🙏💞
श्री मोहा मोहा- राधे राधे🙏💞
श्री विमोहा -राधे राधे🙏💞
श्रीगतिनिष्ठा- राधे राधे🙏💞
श्री गतिप्रदा- राधे राधे🙏💞
गीर्वाणवंद्या -राधे राधे🙏💞
श्री गीर्वाणा- राधे राधे🙏💞
गीर्वाणगणसेविता -राधे राधे🙏💞
श्री ललिता -राधे राधे🙏💞
श्री विशोका -राधे राधे🙏💞
श्री विशाखा -राधे राधे🙏💞
श्री चित्रमालिनी- राधे राधे🙏💞
श्री जितेन्द्रिया- राधे राधे🙏💞
श्रीशुद्धसत्वा- राधे राधे🙏💞
श्री कुलीना -राधे राधे🙏💞
श्री कुलदीपिका -राधे राधे🙏💞
श्री दीपप्रिया- राधे राधे🙏💞
श्री दीपदात्री - राधे राधे🙏💞
श्री विमला -राधे राधे🙏💞
श्री विमलोदका -राधे राधे🙏💞
कांतारवासिनी- राधे राधे🙏💞
श्री कृष्णा- राधे राधे🙏💞
कृष्णचंद्रप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्रीमति -राधे राधे🙏💞
श्री अनुत्तरा- राधे राधे🙏💞
श्री दुखहंत्री -राधे राधे🙏💞
श्री दुखकर्त्री- राधे राधे🙏💞
श्री कुलोद्वहा- राधे राधे🙏💞
श्री लक्ष्मी -राधे राधे🙏💞
श्री धृति- राधे राधे🙏💞
श्री लज्जा -राधे राधे🙏💞
श्री कांति -राधे राधे🙏💞
श्री पुष्टि- राधे राधे🙏💞
श्री स्मृति -राधे राधे🙏💞
श्री क्षमा- राधे राधे🙏💞
क्षीरोदशायिनी -राधे राधे🙏💞
श्री देवी- राधे राधे🙏💞
देवारिकुलमर्दनी- राधे राधे🙏💞
श्री वैष्णवी -राधे राधे🙏💞
श्री महालक्ष्मी- राधे राधे🙏💞
श्री कुलपुज्या- राधे राधे🙏💞
श्री कुलप्रिया- राधे राधे🙏💞
दैत्यानासंहत्री -राधे राधे🙏💞
श्री सावित्री - राधे राधे🙏💞
श्री वेदगामिनी- राधे राधे🙏💞
श्री निरालम्बा- राधे राधे🙏💞
निरालम्बगणप्रिया- राधे राधे🙏💞
निरालम्बजनपुज्या- राधे राधे🙏💞
श्री निरालोका- राधे राधे🙏💞
श्री निराश्रया- राधे राधे🙏💞
श्री एकांगी -राधे राधे🙏💞
श्री सर्वगा -राधे राधे🙏💞
श्री सेवया -राधे राधे🙏💞
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4................
★राधा रानी की जय महारानी की जय-
बोलो बरसाने वारी की जय जय जय--
राधा रानी की जय महारानी की जय--★
🙏💞🙏💞🙏💞
श्री ब्रह्मपत्नी-राधे राधे🙏💞
श्री सरस्वती-राधे राधे🙏💞
श्री रासप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्री रासगम्या -राधे राधे🙏💞
रासाधिष्ठात्री -राधे राधे🙏💞
श्री रसिका-राधे राधे🙏💞
रसिकानंदा-राधे राधे🙏💞
रासेश्वरीपरा-राधे राधे🙏💞
रासमण्डलस्था -राधे राधे🙏💞
रासमण्डलशोभिता- राधे राधे🙏💞
रासमण्डलसेवया-राधे राधे🙏💞
रासक्रीडामनोहरा-राधे राधे🙏💞
पुण्डरीकाक्षनिलया-राधे राधे🙏💞
पुण्डरीकाक्षगेहिनी-राधे राधे🙏💞
पुण्डरीकाक्षसेवया-राधे राधे🙏💞
पुण्डरीकाक्षवल्लभा -राधे राधे🙏💞
सर्वजीवेश्वरी -राधे राधे🙏💞
सर्वजीव वन्दया -राधे राधे🙏💞
श्री परात्परा -राधे राधे🙏💞
श्री प्रकृति -राधे राधे🙏💞
शंभुकांता-राधे राधे🙏💞
सदाशिवमनोहरा -राधे राधे🙏💞
श्री शुते-राधे राधे🙏💞
श्री पिपासा -राधे राधे🙏💞
श्री दया -राधे राधे🙏💞
श्री निद्रा-राधे राधे🙏💞
श्री भ्रांति -राधे राधे🙏💞
श्री श्रांति -,राधे राध🙏💞
श्री क्षमाकुला -राधे राधे🙏💞
श्री वधूरुपा -राधे राध🙏💞
श्री गोपपत्नी,-राधे राधे🙏💞
श्री भारती-राधे राधे🙏💞
श्री सिद्धयोगिनी-राधे राधे🙏💞 
श्री सत्यरुपा-राधे राधे🙏💞
श्री नित्यरुपा -राधे राधे🙏💞
श्री नित्यांगी -राधे राधे🙏💞
श्री नित्यगेहानि -राधे राधे🙏💞
श्री स्थानदात्रि -राधे राधे🙏💞
श्री महालक्ष्मी-राधे राधे🙏💞
श्री स्वयंप्रभा-राधे राधे🙏💞
श्री सिंधुकन्या -राधे राधे🙏💞
आस्थानदात्री -राधे राधे🙏💞
श्री द्वारिकावासिनी -राधे राधे🙏💞
श्री बुद्धि-राधे राधे🙏💞
श्री स्थिति -राधे राधे🙏💞
श्री स्थानरुपा -राधे राधे🙏💞
सर्वकारणकारणा -राधे राधे🙏💞
श्री भक्तप्रिया -राधे राधे🙏💞
श्री भक्तगम्या-राधे राधे🙏💞
भक्तानंदप्रदायिनी-राधे राध🙏💞
भक्तकल्पद्रुमातीता -राधे राधे🙏💞
श्री अतीतगुणा -राधे राधे🙏💞
मनोधिष्ठात्रीदेवी-राधे राधे🙏💞
कृष्णप्रेमपरायणा -राधे राधे,
श्री निरामया -राधे राधे-🙏💞
श्री सौम्यदात्री --राधे राधे🙏💞
🙏💞🙏💞🙏💞
★मेरी प्यारी को नाम श्री राधे-
कृष्ण प्यारी को नाम श्री राधे--
हो नंदवारी को नाम श्री राधे--★
🙏💞🙏💞🙏💞
श्री मदनमोहिनी -राधे राधे🙏💞
एकानंशाशिवा -राधे राधे🙏💞
श्री क्षेमा -राधे राधे🙏💞
श्री दुर्गा -राधे राधे🙏💞
श्री दूर्गतिनाशिनी -राधे राधे🙏💞
श्री ईश्वरी -राधे राधे🙏💞
श्री सर्ववंद्या -राधे राधे🙏💞
श्री गोपनीया - राधे राधे🙏💞
श्री शुभंकरी-- राधे राधे🙏💞
सर्वभुतानांपालिनी- राधे राधे🙏💞
कामांङहारिणी-राधे राधे🙏💞
सद्योमुक्तिप्रदा -राधे राधे🙏💞
श्री वेदसारा -राधे राधे🙏💞
श्री हिमालयसुता -राधे राधे🙏💞
श्री सर्वा -राधे राधे🙏💞
श्री पार्वति-राधे राधे🙏💞
श्री गिरिजा -राधे राधे🙏💞
श्री सति- राधे राधे🙏💞
श्री दक्षकन्या- राधे राधे🙏💞
श्री देवमाता-राधे राधे🙏💞
श्री मन्दलज्जा -राधे राधे🙏💞
श्री हरेस्तनूं- राधे राधे🙏💞
वृंदारण्यप्रिया- राधे राधे🙏💞
श्री वृंदा- राधे राधे🙏💞
वृंदावनविलासिनी -राधे राधे🙏💞
श्री विलासिनी-राधे राधे🙏💞
,श्री वैष्णवी- राधे राधे,🙏💞
ब्रह्मलोकप्रतिष्ठा- राधे राधे🙏💞
श्री रुक्मणी -राधे राधे🙏💞
श्री रेवती -राधे राधे🙏💞
श्री सत्यभामा- राधे राधे🙏💞
श्री जाम्बवती -राधे राधे 🙏💞
श्री सुलक्ष्मणा- राधे राधे 🙏💞
श्री मित्रविन्दा* राधे राधे 🙏💞
श्री कालिन्दी-,राधे राधे🙏💞 
श्री जहन्युकन्या -राधे राधे🙏💞
श्री परिपुर्णा- राधे राधे🙏💞
श्री पुर्णतरा -राधे राधे🙏💞
श्री हैमवती -राधे राधे🙏💞
★ जय जय श्री राधे🙏💞
🙏💞🙏💞🙏💞
जय जय श्री श्यामा प्यारी,,🙏💞
जय हो रसिको की प्यारी--🙏💞

श्री राधानाम 1008 माला

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!! ॐ श्री परमात्मने नमः !!

!! ॐ श्री परमात्मने नमः !!

हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम ! हरे राम ! राम राम हरे हरे
सोलह अक्षरों का ये मंत्र, महामंत्र कहलाता है
कलयुग के दोषों से बस यही हमें बचाता है
शास्त्रों ने कहा इसके अतिरिक्त कोई उपाय नही
कलयुग में और कुछ भी हो सकता सहाय नही
सतयुग में तपस्या से पास हरि के जाते थे
त्रेता में यज्ञों से उन्हें हम पास बुलाते थे
द्वापर में करते थे लोग अर्चा-विग्रह की पूजा
कलयुग में महामंत्र के सिवा उपाय नही दूजा
इस घोर कल्मष के युग में प्रभु की कृपा है
वो बस हरी कीर्तन से ही हमें मिल जाते है
कोई फर्क नही है उनमे और उनके नाम में
महामंत्र से प्रभु को जिह्वा पे हम नचाते हैं
चित्त को हमारे शुद्ध करता है ये हरि कीर्तन
जप-जप के हरि नाम चमक जाता मन दर्पण
बड़ा ही सरल और सटीक तरिका है जीने का
न गवाए हम मौका इस अमृत्व को पीने का
बिना देर किये जहाँ हैं वही से कर दे शुरुआत
कर ले कमाई कुछ जब तक मौत करे आघात
फिर चिंता न हो कि कब मौत से पाला पड़े
जब भी प्राण छूटे दिखे बस प्रभु सामने खड़े
हरे कृष्णा ! हरे कृष्णा! कृष्णा कृष्णा हरे हरे
हरे राम ! हरे राम ! राम राम हरे हरे
श्रीहरिः

!! ॐ श्री परमात्मने नमः !!

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Saturday, December 12, 2015

दैनिक प्रार्थना

दैनिक प्रार्थना

हे परम प्रियतम पूर्णतम पुरूषोत्तम श्रीकृष्ण। तुम से विमुख होने के कारण अनादिकाल से हमने अनन्तानंत दुःख पाए एवं पा रहे हैं। पाप करते करते अन्तःकरण इतना मलिन हो चुका है कि रसिकों द्वारा यह जानने पर भी कि तुम अपनी भुजाओं को पसारे अपनी वात्सल्यमयी दृष्टि से हमारी प्रतीक्षा कर रहे हो, तुम्हारी शरण में नहीं आ पाता।
हे अशरण -शरण! तुम्हारी कृपा के बिना तुम्हें कोई पा भी नहीं सकता। ऐसी स्थिति में, हे अकारण करूण, पतितपावन श्रीकृष्ण! तुम अपनी अहैतुकी कृपा से ही हमको अपना लो।
हे करूणासागर! हम भुक्ति -मुक्ति आदि कुछ नहीं माँगते, हमें तो केवल तुम्हारे निष्काम प्रेम की ही एकमात्र चाह है।
हे नाथ! अपने विरद की ओर देखकर इस अधम को निराश न करो।
हे जीवनधन! अब बहुत हो चुका, अब तो तुम्हारे प्रेम के बिना यह जीवन मृत्यु से भी अधिक भयानक है। अतएव
प्रेमभिक्षां देहि, प्रेमभिक्षां देहि, प्रेम भिक्षां देहि।
साकेत बिहारी श्रीराघवेन्दर सरकार की जय।
वृन्दावन विहारी श्री यादवेनदर सरकार की जय।
श्रीमद् सदगुरू सरकार की जय।
जय जय श्री राधे

दैनिक प्रार्थना

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 कृष्ण और उनकी प्रेम लीलाएँ

कृष्ण और उनकी प्रेम लीलाएँ

एक समय की बात है, जब किशोरी जी को यह पता चला कि कृष्ण पूरे गोकुल में माखन चोर कहलाता है तो उन्हें बहुत बुरा लगा उन्होंने कृष्ण को चोरी छोड़ देने का बहुत आग्रह किया। पर जब ठाकुर अपनी माँ की नहीं सुनते तो अपनी प्रियतमा की कहा से सुनते। उन्होंने माखन चोरी की अपनी लीला को जारी रखा।
एक दिन राधा रानी ठाकुर को सबक सिखाने के लिए उनसे रूठ गयी। अनेक दिन बीत गए पर वो कृष्ण से मिलने नहीं आई।जब कृष्णा उन्हें मनाने गया तो वहां भी उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया। तो अपनी राधा को मनाने के लिए इस लीलाधर को एक लीला सूझी।। ब्रज में लील्या गोदने वाली स्त्री को लालिहारण कहा जाता है। तो कृष्ण घूंघट ओढ़ कर एक लालिहारण का भेष बनाकर बरसाने की गलियों में पुकार करते हुए घूमने लगे। जब वो बरसाने, राधा रानी की ऊंची अटरिया के नीचे आये तो आवाज़ देने लगे।। मै दूर गाँव से आई हूँ, देख तुम्हारी ऊंची अटारी, दीदार की मैं प्यासी, दर्शन दो वृषभानु दुलारी। हाथ जोड़ विनंती करूँ, अर्ज मान लो हमारी, आपकी गलिन गुहार करूँ, लील्या गुदवा लो प्यारी।। जब किशोरी जी ने यह आवाज सुनी तो तुरंत विशाखा सखी को भेजा और उस लालिहारण को बुलाने के लिए कहा। घूंघट में अपने मुँह को छिपाते हुए कृष्ण किशोरी जी के सामने पहुंचे और उनका हाथ पकड़ कर बोले कि कहो सुकुमारी तुम्हारे हाथ पे किसका नाम लिखूं। तो किशोरी जी ने उत्तर दिया कि केवल हाथ पर नहीं मुझे तो पूरे  श्री अंग पर लील्या गुदवाना है और
क्या लिखवाना है, किशोरी जी बता रही हैं।। माथे पे मदन मोहन, पलकों पे पीताम्बर धारी नासिका पे नटवर, कपोलों पे कृष्ण मुरारी अधरों पे अच्युत, गर्दन पे गोवर्धन धारी कानो में केशव, भृकुटी पे चार भुजा धारी
छाती पे छलिया, और कमर पे कन्हैया जंघाओं पे जनार्दन, उदर पे ऊखल बंधैया गुदाओं पर ग्वाल, नाभि पे नाग नथैया बाहों पे लिख बनवारी, हथेली पे हलधर के भैया नखों पे लिख नारायण, पैरों पे जग पालनहारी
चरणों में चोर चित का, मन में मोर मुकुट धारी नैनो में तू गोद दे, नंदनंदन की सूरत प्यारी और
रोम रोम पे लिख दे मेरे, रसिया रास बिहारी जब ठाकुर जी ने सुना कि राधा अपने रोम रोम पर मेरा नाम लिखवाना चाहती है, तो ख़ुशी से बौरा गए प्रभू उन्हें अपनी सुध न रही, वो भूल गए कि वो एक लालिहारण के वेश में बरसाने के महल में राधा के सामने ही बैठे हैं। वो खड़े होकर जोर जोर से नाचने लगे। उनके इस व्यवहार से किशोरी जी को बड़ा आश्चर्य हुआ की इस लालिहारण को क्या हो गया। और तभी उनका घूंघट गिर गया और ☺ललिता सखी को उनकी सांवरी सूरत का दर्शन हो गया और वो जोर से बोल उठी कि अरे..... ये तो बांके बिहारी ही है। अपने प्रेम के इज़हार पर किशोरी जी बहुत लज्जित हो गयी और अब उनके पास कन्हैया को क्षमा करने के आलावा कोई रास्ता न था। ठाकुरजी भी किशोरी का अपने प्रति अपार प्रेम जानकर गदगद् और भाव विभोर हो गए ..
🙏🌹जय श्री कृष्ण🌹🙏

कृष्ण और उनकी प्रेम लीलाएँ

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गीता में श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए सफलता के कुछ मंत्र


गीता में श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए सफलता के कुछ मंत्र

दूरगामी सोच :

श्रीकृष्ण की ओर से बोले गए ज्ञान के श्लोकों पर आधारित भागवत गीता के अनुसार हमें सोच को संकुचित बनाने के स्थान पर दूरगामी और व्यापक बनानी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर जब पांडव मोम के लाक्षागृह में फंस गए तो महज एक चूहा उन्हें उपहार में दिया और केवल एक चूहे के जरिए पांडवों ने लाक्षागृह से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ जीवन को सुरक्षित किया। यह दूरगामी सोच का ही परिणाम रहा।

डर के आगे जीत : 

गीता के अनुसार अगर आपके सामने समस्या विकराल बनती जा रही है और फिर भी समाधान नहीं कर पा रहे हैं तो भी हिम्मत न हारे और चिंतन करने के साथ ही समस्या का सामना करें।
मुसीबतों से घबराने की जगह उसका सामना करना ही सबसे बड़ी शक्ति है। एक बार डर को पार कर लिया तो समझो जीत आपके कदमों में।
पांडवों ने भी धर्म के सहारे युद्ध जीता था।

प्रगति पथ पर प्रशस्त :

श्रीकृष्ण ने हमेशा पांडवों से यही कहा कि पीछे हटने की बजाए प्रगति पथ पर मार्ग प्रशस्त करें। उदाहरण के तौर पर यदि एक कर्मचारी कम्पनी से लगाव होने के कारण जीवन बढिया अवसरों को छोड़ रहा है,तो यह मूर्खता है। क्योंकि अटैचमेंट टैलेन्ट को मार देता है। ऐसे में अगर आपको ज्यादा स्कोप,स्थान परिवर्तन में दिखाई देता है,तो फिर स्थान परिवर्तन करने में ही फायदा है।

ऋषिकेश बने : 

श्रीकृष्ण को ऋषिकेश भी कहा जाता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है ऋषक और ईश यानी इन्द्रियों को वश में करने वाला स्वामी। श्रीकृष्ण की भक्ति करने वाला व्यक्ति बुद्धि पर विजय प्राप्त करने में सक्षम रहता है। गीता के अनुसार हवा को वश में करना तो फिर भी संभव है, लेकिन दिमाग को वश में कर पाना असंभव है। बावजूद इसके जिसका मन पर कंट्रोल हो गया वह आसानी से हर जगह सफलता हासिल कर सकता है।

स्मृति,ज्ञान और बुद्धि :

गीता में श्रीकृष्ण ने एक श्लोक के माध्यम से उल्लेखित किया है कि किसी भी क्षेत्र में सफल होने के लिए स्मृति और बुद्धि का स्वस्थ होना अनिवार्य है। बुद्धि मतलब अच्छी चीजों को परखने की क्षमता, ज्ञान मतलब सभी पहलुओं की बारीकी से जानकारी और स्मृति यानी बुरी को भुलाने और अच्छी को याद करने की क्षमता। यदि इन तीनों पर युवा फोकस करें तो जीवन की सत्तर फीसदी कठिनाइयों से छुटकारा पाया जा सकता है।
कृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा है। अभी तक हम उन्हें अलग-अलग देखते आए हैं। कोई योगेश्वर कृष्ण कहता है,कोई भगवान,तो कोई राधा का प्रेमी,कोई द्रोपदी का सखा,अर्जुन के गुरु,तो कोई कुछ और।
सूरदास के कृष्ण बालक है,महाभारत के कृष्ण गुरु है तो भागवत के कृष्ण इससे भिन्न है। सब उन्हें अपने-अपने नजरिए से देखते हैं।
भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न रूप में उनकी पूजा करते हैं। कृष्ण संपूर्ण जीवन के समर्थक है। वे पल-पल आनन्द से जीने की प्रेरणा देते हैं।
बस जरूरत है पूरे मनोयोग से उस पर अमल करने की और आगे बढ़ने की। यकीन मानिए सफलता आपके कदम चूमेगी।

जय श्री कृष्ण
राधे राधे

गीता में श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए सफलता के कुछ मंत्र

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Saturday, December 5, 2015

श्री कृष्ण  परमधाम


 श्री कृष्ण परमधाम

भगवान राम और श्री कृष्ण विष्णु के अवतार हैं यह बात शास्त्रों और पुराणों में लिखा है। लेकिन राम पृथ्वी त्याग करने के बाद विष्णु में लीन हो गए लेकिन कृष्ण का अपना एक लोक है जिसे गोलोक कहते हैं। गीता और ब्रह्मसंहिता में गोलोक के सौन्दर्य और नजारों का वर्णन किया गया है।

गीता में श्री कृष्ण ने कहा है कि न तद्भासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।।

अर्थात्, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि मेरा परम धाम न तो सूर्य या चन्द्रमा द्वारा, न ही अग्नि या बिजली द्वारा प्रकाशित होता है। जो लोग यहां पहुंच जाते हैं वह इस भौतिक जगत में फिर कभी लौटकर नहीं आते हैं।

गोलोक में प्रकाश के लिए न तो चन्द्रमा की आवश्यक्ता है न सूर्य की। यहां तो परब्रह्म की ज्योति प्रकाशमान है, इन्हीं की ज्योति से गोलोक प्रकाशित है। यहां पर राधा और कृष्ण नित्य विराजमान रहते हैं और कृष्ण की बंशी की मधुर तान से संपूर्ण लोक आनंदित और स्वस्थ रहता है।

मंद-मंद सुगंधित हवाएं चलती हैं। भूख-प्यास, रोग, दोष, चिंता का यहां कहीं नामोनिशान नहीं है। गौएं और श्री कृष्ण की सखी एवं सखाएं इनकी सेवा करके आनंदित रहते हैं। यहां न किसी को स्वामी भाव का अभिमान है और न किसी को दास भाव की वेदना है।

इसलिए कहा गया है कि मनुष्य जिसे भगवान ने मध्य लोक यानी पृथ्वी पर भेजा है उसे गोलोक की प्राप्ति के लिए श्री कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए। जो इनकी भक्ति भावना से विमुख होता है वह अधोगति को प्राप्त होता है यानी नीच योनियों में अर्थात कीट, पतंग और पशु-पक्षियों के रूप में जन्म लेकर दुःख भोगते हैं।

हे अर्जुन! जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है ॥6॥ गीता अध्याय 15, श्लोक

हे अर्जुन! ब्रह्मलोक सहीत सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परन्तु हे कुन्तीपुत्र! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य हैं॥16॥ गीता अध्याय 8, श्लोक 16 

हे अर्जुन! अव्यक्त 'अक्षर' इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते हैं तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते, वह मेरा परम धाम है॥21॥ गीताअध्याय 8, श्लोक 21.

* परमधाम *

(1) यहां के रहिवासी श्रीकृष्ण हैँ।

(2) यहां से पुर्नजन्म पतन नहीँ हैँ।

(3) यहां का सुख नित्य अक्षय हैँ।

(4) ये स्थान चैतन के उपर हैँ।

(5) परमधाम सर्वोच्च यानी सबके उपर हैँ।

(6) परमधाम स्वंयम् प्रकाशित हैँ।

श्री कृष्ण परमधाम

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Friday, December 4, 2015

भगवान श्रीकृष्ण के पुत्रों के नाम

भगवान श्रीकृष्ण के पुत्रों के नाम


हम बताना चाहते हैं कि श्रीकृष्ण एक साधरण मानव थे, लेकिन वे अपनी यौगिक साधना और क्षमता से असाधारण मानव बन गए थे। उनमें दिव्य शक्तियां थीं और उन पर परमेश्वर की कृपा थी। उनको परशुराम ने सुदर्शन चक्र दिया था और उनकी कई देवी और देवताओं ने सहायता की थी।
उन्होंने अन्याय के खिलाफ काम किया और धर्म तथा राज्य को एक नई व्यवस्था दी। महाभारत युद्ध के पश्‍चात्य वे 35 वर्षों तक जिंदा रहे और द्वारिका में अपनी आठ पत्नियों के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत किया। यहां प्रस्तुत है उनकी प्रत्येक पत्नी से उत्पन्न हुए 80 संतानों के नाम। हालांकि संतानें तो उनकी और भी थीं।

1.रुक्मिणी : प्रद्युम्न, चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू और चारू।
2.सत्यभामा : भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु।
3.जाम्बवंती : साम्ब, सुमित्र, पुरुजित, शतजित, सहस्त्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ और क्रतु।
4.सत्या : वीर, चन्द्र, अश्वसेन, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुन्ति।
5.कालिंदी : श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास और सोमक।
6.लक्ष्मणा : प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊर्ध्वग, महाशक्ति, सह, ओज और अपराजित।
7.मित्रविन्दा : वृक, हर्ष, अनिल, गृध्र, वर्धन, अन्नाद, महांस, पावन, वह्नि और क्षुधि।
8.भद्रा : संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक।


भगवान श्रीकृष्ण के पुत्रों के नाम

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कौन थे कृष्ण के बड़े शत्रु


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शिशुपाल :

 शिशुपाल 3 जन्मों से श्रीकृष्ण से बैर-भाव रखे हुआ था। इस जन्म में भी वह विष्णु के पीछे पड़ गया। दरअसल, शिशुपाल भगवान विष्णु का वही द्वारपाल था जिसे कि सनकादि मुनियों ने शाप दिया था।
वे जय और विजय अपने पहले जन्म में हिरण्यकश्यपु और हिरण्याक्ष, दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा अंतिम तीसरे जन्म में कंस और शिशुपाल बने। कृष्ण ने प्रण किया था कि मैं शिशुपाल के 100 अपमान क्षमा करूंगा अर्थात उसे सुधरने के 100 मौके दूंगा।

शिशुपाल का वध : 

एक बार की बात है कि जरासंघ का वध करने के बाद श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम इन्द्रप्रस्थ लौट आए, तब धर्मराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारी करवा दी। उस यज्ञ के ऋतिज आचार्य होते थे।

यज्ञ में युधिष्ठिर ने भगवान वेद व्यास, भारद्वाज, सुनत्तु, गौतम, असित, वशिष्ठ, च्यवन, कण्डव, मैत्रेय, कवष, जित, विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिन, क्रतु, पैल, पाराशर, गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, परशुराम, शुक्राचार्य, आसुरि, वीतहोत्र, मधुद्वंदा, वीरसेन, अकृतब्रण आदि सभी को आमंत्रित किया। इसके अलावा सभी देशों के राजाधिराज को भी बुलाया गया।

यज्ञ पूजा के बाद यज्ञ की शुरुआत के लिए समस्त सभासदों में इस विषय पर विचार होने लगा कि सबसे पहले किस देवता की पूजा की जाए? तब सहदेवजी उठकर बोले- श्रीकष्ण ही सभी के देव हैं जिन्हें ब्रह्मा और शंकर भी पूजते हैं, उन्हीं को सबसे पहले पूजा जाए।
पांडु पुत्र सहदेव के वचन सुनकर सभी ने उनके कथन की प्रशंसा की। भीष्म पितामह ने स्वयं अनुमोदन करते हुए सहदेव का समर्थन किया। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने शास्त्रोक्त विधि से भगवान श्रीकृष्ण का पूजन आरंभ किया।
इस कार्य से चेदिराज शिशुपाल अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बोला, 'हे सभासदों! मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कालवश सभी की मति मारी गई है। क्या इस बालक सहदेव से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति इस सभा में नहीं है, जो इस बालक की हां में हां मिलाकर अयोग्य व्यक्ति की पूजा स्वीकार कर ली गई है? क्या इस कृष्ण से आयु, बल तथा बुद्धि में और कोई भी बड़ा नहीं है? क्या इस गाय चराने वाल ग्वाले के समान कोई और यहां नहीं है? क्या कौआ हविश्यान्न ले सकता है? क्या गीदड़ सिंह का भाग प्राप्त कर सकता है? न इसका कोई कुल है, न जाति, न ही इसका कोई वर्ण है। राजा ययाति के शाप के कारण राजवंशियों ने इस यदुवंश को वैसे ही बहिष्कृत कर रखा है। यह जरासंघ के डर से मथुरा त्यागकर समुद्र में जा छिपा था। भला यह किस प्रकार अग्रपूजा पाने का अधिकारी है?'
इस प्रकार शिशुपाल श्रीकृष्ण को अपमानित कर गाली देने लगा। यह सुनकर शिशुपाल को मार डालने के लिए पांडव, मत्स्य, केकय और सृचयवर्षा नरपति क्रोधित होकर हाथों में हथियार ले उठ खड़े हुए, किंतु श्रीकृष्ण ने उन सभी को रोक दिया। वहां वाद-विवाद होने लगा, परंतु शिशुपाल को इससे कोई घबराहट न हुई। कृष्ण ने सभी को शांत कर यज्ञ कार्य शुरू करने को कहा।

किंतु शिशुपाल को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने फिर से श्रीकृष्ण को ललकारते हुए गाली दी, तब श्रीकृष्ण ने गरजते हुए कहा, 'बस शिशुपाल! मैंने तेरे एक सौ अपशब्दों को क्षमा करने की प्रतिज्ञा की थी इसीलिए अब तक तेरे प्राण बचे रहे। अब तक सौ पूरे हो चुके हैं। अभी भी तुम खुद को बचा सकने में सक्षम हो। शांत होकर यहां से चले जाओ या चुप बैठ जाएं, इसी में तुम्हारी भलाई है।'

लेकिन शिशुपाल पर श्रीकृष्ण की चेतावनी का कोई असर नहीं हुआ अतः उसने काल के वश होकर अपनी तलवार निकालते हुए श्रीकृष्ण को फिर से गाली दी। शिशुपाल के मुख से अपशब्द के निकलते ही श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र चला दिया और पलक झपकते ही शिशुपाल का सिर कटकर गिर गया। उसके शरीर से एक ज्योति निकलकर भगवान श्रीकृष्ण के भीतर समा गई।

वचन क्यों दिया था? : शिशुपाल कृष्ण की बुआ का लड़का था। जब शिशुपाल का जन्म हुआ तब उसके 3 नेत्र तथा 4 भुजाएं थीं। वह गधे की तरह रो रहा था। माता-पिता उससे घबराकर उसका परित्याग कर देना चाहते थे, लेकिन तभी आकाशवाणी हुई कि बालक बहुत वीर होगा तथा उसकी मृत्यु का कारण वह व्यक्ति होगा जिसकी गोद में जाने पर बालक अपने भाल स्थित नेत्र तथा दो भुजाओं का परित्याग कर देगा।

इस आकाशवाणी और उसके जन्म के विषय में जानकर अनेक वीर राजा उसे देखने आए। शिशुपाल के पिता ने बारी-बारी से सभी वीरों और राजाओं की गोद में बालक को दिया। अंत में शिशुपाल के ममेरे भाई श्रीकृष्ण की गोद में जाते ही उसकी 2 भुजाएं पृथ्वी पर गिर गईं तथा ललाटवर्ती नेत्र ललाट में विलीन हो गया। इस पर बालक की माता ने दु:खी होकर श्रीकृष्ण से उसके प्राणों की रक्षा की मांग की।

श्रीकृष्ण ने कहा कि मैं इसके 100 अपराधों को क्षमा करने का वचन देता हूं। कालांतर में शिशुपाल ने अनेक बार श्रीकृष्ण को अपमानित किया और उनको गाली दी, लेकिन श्रीकृष्ण ने उन्हें हर बार क्षमा कर दिया।

शिशुपाल क्यों करता था अपमान? : क्योंकि शिशुपाल रुक्मणि से विवाह करना चाहता था। रुक्मणि के भाई रुक्म का वह परम मित्र था। रुक्म अपनी बहन का विवाह शिशुपाल से करना चाहता था और रुक्मणि के माता-पिता रुक्मणि का विवाह श्रीकृष्ण के साथ करना चाहते थे, लेकिन रुक्म ने शिशुपाल के साथ रिश्ता तय कर विवाह की तैयारियां शुरू कर दी थीं। कृष्ण रुक्मणि का हरण कर ले आए थे। ‍

पौंड्रक :

 चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक कहते थे। कुछ मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह ‘पुरुषोत्तम’ नाम से सुविख्यात था। इसके पिता का नाम वसुदेव था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी की तट पर किरात, वंग, एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।

पौंड्रक को उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव और वही विष्णु का अवतार है, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती है। 

राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि ‘पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया है। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा है। इन चिह्रों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं है। तुम इन चिह्रों को एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।’

बहुत समय तक श्रीकृष्ण उसकी बातों और हरकतों को नजरअंदाज करते रहे, बाद में उसकी ये सब बातें अधिक सहन नहीं हुईं। उन्होंने प्रत्युत्तर भेजा, ‘तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।' 

यह सुनकर, पौंड्रक कृष्ण के विरुद्ध युद्ध की तैयारी शुरू करने लगा। अपने मित्र काशीराज की सहायता प्राप्त करने के लिए यह काशीनगर गया। यह सुनते ही कृष्ण ने ससैन्य काशीदेश पर आक्रमण किया।

कृष्ण आक्रमण कर रहे हैं- यह देखकर पौंड्रक और काशीराज अपनी अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर आए। युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण किया था एवं यह गरूड़ पर आरूढ़ था।

नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस ‘नकली कृष्ण’ को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।

बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपटरूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मौत का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।


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