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Monday, March 28, 2016


जय श्री कृष्ण
ठाकुर जी और उनके भक्त की एक निराली कथा .......
एक लडकी थी जो कृष्ण जी की अनन्य भक्त थी, बचपन से ही कृष्ण भगवान का भजन करती थी, भक्ति करती थी, भक्ति करते-करते बड़ी हो गई, भगवान की कृपासे उसका विवाह भी श्रीधाम वृंदावन में किसी अच्छे घर में हो गया.
विवाह होकर पहली बार वृंदावन गई, पर नई दुल्हन होने से कही जा न सकी, और मायके चलि गई.
और वो दिन भी आया जब उसका पति उसे लेने उसके मायके आया,
अपने पति के साथ फिर वृंदावन पहुँच गई, पहुँचते पहुँचते उसे शाम हो गई, पति वृंदावन में यमुना किनारे रूककर कहने लगा -
देखो! शाम का समय है में यमुना जी मे स्नान करके अभी आता हूँ,
तुम इस पेड़ के नीचे बैठ जाओ और सामान की देखरेख करना मै थोड़े ही समय में आ जाऊँगा यही सामने ही हूँ, कुछ लगे तो मुझे आवाज देदेना, इतना कहकर पति चला गया और वह लडकी बैठ गई.
अब एक हाथ लंबा घूँघट निकाल रखा है, क्योकि गाँव है,ससुराल है और वही बैठ गई, मन ही मन विचार करने लगी - कि
देखो!ठाकुर जी की कितनी कृपाहै उन्हें मैंने बचपन से भजा और उनकी कृपा से मेरा विवाह भी श्री धाम वृंदावन में हो गया.
मैं इतने वर्षों से ठाकुर जी को मानती हूँ परन्तु अब तक उनसेकोई रिश्ता नहीं जोड़ा?
फिर सोचती है ठाकुर जी की उम्र क्या होगी ?
लगभग १६ वर्ष के होंगे, मेरे पति २० वर्ष केहै उनसे थोड़े से छोटे है, इसलिए मेरे पति के छोटे भाई की तरह हुए, और मेरे देवर की तरह, तो आज से ठाकुर जी मेरे देवर हुए, अब तो ठाकुर जी से नया सम्बन्ध जोड़कर बड़ी प्रसन्न हुई और मन ही मन ठाकुर जी से कहने लगी -
देखो ठाकुर जी ! आज से मै तुम्हारी भाभी और तुम मेरे देवर हो गए, अब वो समय आएगा जब तुम मुझे भाभी-भाभी कहकर पुकारोगे. इतना सोच ही रही थी तभी एक १०- १५ वर्ष का बालक आया और उस लडकी से बोला - भाभी-भाभी !
लडकी अचानक अपने भाव से बाहर आई और सोचने लगी वृंदावन में तो मै नई हूँ ये भाभी कहकर कौन बुला रहा है,
नई थी इसलिए घूँघट उठकर नहीं देखा कि गाँव के किसी बड़े-बूढ़े ने देख लिया तो बड़ी बदनामी होगी.
अब वह बालक बार-बार कहता पर वह उत्तर न देती बालक पास आया और बोला -
भाभी! नेक अपना चेहरा तो देखाय दे,
अब वह सोचने लगी अरे ये बालक तो बड़ी जिद कर रहा है इसलिए कस केघूँघट पकड़कर बैठ गई कि कही घूँघट उठकर देखन ले, लेकिन उस बालक ने जबरजस्ती घूँघट उठकर चेहरा देखा और भाग गया.
थोड़ी देर में उसका पति आ गया, उसनेसारी बात अपने पतिसे कही.
पति नेकहा - तुमने मुझे आवाज क्यों नहीं दी ? लड़की बोली - वह तो इतनेमें भाग ही गया था.
पति बोला - चिंता मत करो, वृंदावन बहुत बड़ा थोड़े ही है ,
कभी किसी गली में खेलता मिल गया तो हड्डी पसली एक कर दूँगा फिर कभी ऐसा नहीं कर सकेगा.
तुम्हे जहाँ भी दिखे, मुझे जरुर बताना.
फिर दोनों घर गए,
कुछ दिन बाद उसकी सास नेअपने बेटे से कहा- बेटा! देख तेरा विवाह हो गया, बहू मायके से भी आ गई,
पर तुम दोनों अभी तक बाँके बिहारी जी केदर्शन के लिए नहीं गए कल जाकर बहू को दर्शन कराकर लाना. अब अगले दिन दोनों पति पत्नी ठाकुर जी के दर्शन केलिए मंदिर जाते है मंदिर में बहुत भीड़ थी,
लड़का कहने लगा -
देखो! तुम स्त्रियों के साथ आगे जाकर दर्शन करो, में भी आता हूँ अब वह आगे गई पर घूंघट नहीं उठाती उसे डर लगता कोई बड़ा बुढा देखेगा तो कहेगा नई बहू घूँघट के बिना घूम रही है.
बहूत देर हो गई पीछे से पति ने आकर कहा -
अरी बाबली ! बिहारी जी सामनेहै, घूँघट काहे नाय खोले,घूँघट नाय खोलेगी तो दर्शन कैसे करेगी,
अब उसने अपना घूँघट उठाया और जो बाँके बिहारी जी की ओर देखातो बाँके बिहारी जी कि जगह वही बालक मुस्कुराता हुआ दिखा तो एकदम से चिल्लाने लगी - सुनिये जल्दी आओ!
जल्दी आओ !
पति पीछेसे भागा- भागा आया बोला क्या हुआ?
लड़की बोली - उस दिन जो मुझे भाभी-भाभी कहकर भागा था वह बालक मिल गया.
पति ने कहा - कहाँ है ,अभी उसे देखता हूँ ?
तो ठाकुर जी की ओर इशारा करके बोली- ये रहा, आपके सामनेही तो है,
उसके पति ने जो देखा तो अवाक रह गया और वही मंदिर में ही अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा बोला तुम धन्य हो वास्तव में तुम्हारे ह्रदय में सच्चा भाव ठाकुर जी के प्रति है,
मै इतने वर्षों से वृंदावन मै हूँ मुझे आज तक उनकेदर्शन नहीं हुए और तेरा भाव इतना उच्च है कि बिहारी जी के तुझे दर्शन हुए..................................
भक्त और भगवान् की जय .....

श्री कृष्ण जी और उनके भक्त की एक निराली कथा

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Sunday, January 3, 2016

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

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सनातन जी अपना सब कुछ दान करके महाप्रभु के सेवक बन गये थे और उनकी आज्ञा से वृन्दावन मे भक्ति का प्रचार करते थे.सनातन जी एक दिन यमुना में स्नान करने के निमित्त जा रहे थे रास्ते में एक पारस पत्थर का टुकडा़ इन्हें पडा़ मिला, इन्होने उसे वही धूलि में ढक दिया.

अकस्मात उसी दिन एक ब्राहाण उनके पास आकर धन की याचना करने लगा इन्होने बहुत कहा -भाई हम भिक्षुक है माँगकर खाते है,भला हमारे पास धन कहाँ है किन्तु वह कहने लगा – महाराज! मैंने धन की कामना से ही अनेको वर्षो तक शिव जी की आराधना की,उन्होंने संतुष्ट होकर रात्रि के समय स्वप्न में मुझसे कहा -हे ब्राहाण तू जिस इच्छा से मेरा पूजन कर रहा है वह इच्छा तेरी वृन्दावन में सनातन जी गोस्वामी के समीप जाने से पूरी होगी बस उन्ही के स्वपन से में आप की शरण में आया हूँ.

इस पर सनातन जी को उस पारस पत्थर की याद आई उन्होंने कहा -अच्छी बात है मेरे साथ यमुना किनारे आओ,दूर से ही इशारा करते हुए उन्होंने कहा -यहाँ कही पारस पत्थर है उस ब्राहमण ने बहुत ढूँढा,थोड़ी देर बाद उसे पारस पत्थर मिल गया उसी समय उसने एक लोहे का टुकड़े से उसे छुआकर उसकी परीक्षा की देखते ही देखते लोहा सोना बन गया ब्राहाण प्रसन्न होकर घर चल दिया.

वह आधे रास्ते तक पँहुचा की उसका विचार एकदम बदल गया उसने सोचा जो महापुरुष घर-घर जाकर टुकडे माँगकर खाता है और संसार की इतनी बहुमूल्य समझी जाने वाली इस मणि को स्पर्श तक नहीं करता अवश्य ही उसके पास इस असाधारण पत्थर से बढकर भी कोई और वस्तु है मै तो उनसे उसी को प्राप्त करुँगा !

इस पारस को देकर तो उन्होंने मुझे बहलाया है, यह सोच कर वह लौटकर फिर इनके समीप आया और चरणों में गिरकर रो-रोकर अपनी मनोव्यथा सुनाई उसके सच्चे वैराग्य को देखकर इन्होने पारस को यमुना जी में फिकवा दिया और उसे अमूल्य हरिनाम का उपदेश किया जिससे वह कुछ काल में ही संत बन गया.

किसी ने सच ही कहा है –
“ पारस में अरु संत में, संत अधिक कर मान |
वह लोहा सोना करै यह करै आपु समान ||”

!! जय जय श्री राधे !

श्री सनातन जी और पारस पत्थर

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Thursday, December 17, 2015

टेढ़े कान्हा

टेढ़े कान्हा

एक बार की बात है - वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण - राधे कृष्ण जप रहा था । अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला - अरे जपना ही है तो सीता राम जपो, क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ?
वृन्दावन का साधू भडक कर बोला - ज़रा जुबान संभाल कर बात करो, हमारी जुबान भी पान भी खिलाती हैं तो लात भी खिलाती है । तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ?
अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ? तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो- 
उनका नाम टेढ़ा - कृष्ण
उनका धाम टेढ़ा - वृन्दावन
वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया, पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है, ये तुम कैसे कह रहे हो ?
अयोध्या वाला साधू बोला - अच्छा अब ये भी बताना पडेगा ? तो सुन - 
जमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माखन चुराना - ये कौन सीधे लोगों के काम हैं ? और आज तक ये बता कभी किसी ने उसे सीधे खडे देखा है कभी ?
वृन्दावन के साधू को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई , और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर । अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला - इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने ।  ये लो अपनी लुकटी, ये लो अपनी कमरिया, और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो । हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में । और सब पटक कर साधू चल दिये ।अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे । साधू की बाँह पकड कर बोले अरे " भई तुझे किसी ने गलत भडका दिया है " पर साधू नही माना तो बोले, अच्छा जाना है तो तेरी मरजी , पर ये तो बता राम जी सीधे और मै टेढ़ा कैसे ? कहते हुए बिहारी जी कूंए की तरफ नहाने चल दिये ।

वृन्दवन वाला साधू गुस्से से बोला -

" नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण, 
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन, 

काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा, कभी गोपियों के वस्त्र चुरा, 
और सीधे तुझे कभी किसी ने खड़े होते नहीं देखा। तेरा सीधा है किया"। 
अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बइज़्जती की सारी भड़ास निकाल दी।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुप से अपनी बाल्टी कूँए में गिरा दी । 
फिर साधू से बोले अच्छा चला जाइये, पर जरा मदद तो कर जा, तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं । साधू सरिया ला देता है और कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं ।
साधू बोला अब समझ आइ कि तौ मैं अकल भी ना है। अरै सीधै सरिये से बाल्टी भला कैसे निकलेगी ? 
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आवेगी ।
बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले - जब सीधापन इस छोटे से कूंए से एक छोटी सी बालटी नहीं निकाल पा रहा, तो तुम्हें इतने बडे भवसागर से कैसे पार लगा सकेगा ? अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की है ।
" बोलो टेढ़े वृन्दावन बिहारी लाल की जय "

टेढ़े कान्हा

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कृष्ण भक्ती

कृष्ण भक्ती
भगवान श्रीकृष्ण के भक्त रसखान एक मुसलमान व्यक्ति थे। एक बार वो अपने उस्ताद के साथ मक्का मदीना, हज पर जा रहे थे, 
उनके उस्ताद ने कहा:- "देखो हिन्दुओं का तीर्थ स्थल वृन्दावन आने वाला है, वहाँ एक कालिया नाग रहता है।
मैंने सुना है नाग वृंदावन आने बाले यात्रियों को डस लेता है। इसलिये तुम सम्भल कर चलना, इधर-उधर ताक-झाँक नहीं करना, सीधे मेरे पीछे-पीछे चलना। उस्तादजी कि बातें सुनकर रसखान को कालिया नाग देखने उत्सुकता होने लगी। उन्होंने सुन रखा था वृंदावन कृष्ण धाम है, फिर यहाँ नाग लोगों को कैसे डँस सकता है?
यह सोचते हुए वो चले जा रहे थे कि बिहारीजी ने अपनी लीला प्रारम्भ करना शुरू कर दिया। प्रभु ने सोचा, देखूँ ये कब तक बिना इधर-उधर देखे बच सकता है। और फिर बिहारीजी ने अपने मुरली की प्यारी धुन छेड़ दि।
रसखान अभी बचने की कोशिश ही कर रहे थे कि प्रभु के पाँव की नुपुर भी बजने लगी। मुरली और नूपुर की रुनझुन ने ऐसा जादू किया कि रसखान को अब अपने ऊपर नियंत्रण रखना मुश्किल हो रहा था। उस्तादजी की काला नाग वाली बात भी याद आ रही थी, अब वो करे तो क्या करें। मुरली तथा नुपुर की धुनें सुन उनका मन मुग्ध हुए जा रहा था। इतने में यमुना नदी आ गयी, और रसखान देखे बिना नहीं रह सके। वहाँ श्रीबिहारीजी अपनी प्रियाजी के साथ विराजमान थे। रसखान उनकी एक झलक पाकर मतवाले हो गए। मुरलीधर के युगल छवि के दर्शन पाकर वो भूल गए कि ख़ुद कहाँ हैं, और उनके उस्तादजी कहाँ गए। रसखान अपनी सुध-बुध खो बैठे, उन्हें अपना ध्यान ही नहीं रहा। वे ब्रज की रज में लोट पोट हो रहे थे, मुँह से उनके झाग निकलने लगा।
इधर-उधर वो पागलों की तरह श्रीबिहारीजी को ढूँढने लगे। उनकी साँवली छवि उनके आँखो से हट नहीं रही थी।
परन्तु प्रभु अपनी लीला कर अन्तर्ध्यान हो गए। सखी ! 
 मोय कारौ नाग डस्यौ....
व्यापि गयौ विष नस-नस बरबस, 
उर तैं जगत खस्यौ॥
बिस बगराय, भुजंगम भीषन मृदु मधु हँसी हँस्यौ।
हँसतहिं विष अति भयौ मधुर सो, अवसर पाइ धँस्यौ॥
विष भयौ अमिय, नाग पुनि मोहन,मधु मधुरिमा लस्यौ।
करत किलोल कलित अकलन, रस-सुधा-स्रोत निकस्यौ॥
स्याम-मनहि सौं एकमेक मन अमन होइ बिकस्यौ।
कौ जानै कब लौं यौं मोहन मो महँ रह्यौ धँस्यौ॥
जाके नाम कटत भव-बन्धन, सो स्वयमेव ड्डँस्यौ।
ह्वै परतंत्र, सुतंत्र परम सो अपनेहि बंध कस्यौ॥
सखी ! मोय कारौ नाग डस्यौ.... 

थोड़ी दूर जाकर जब उस्तादजी ने पीछे मुड़कर देखा, उन्हें रसखान कहीं नज़र नहीं आया, वो वापस पीछे आए और रसखान की दशा देखकर समझ गए कि उन्हें कालिया नाग ने डँस लिया है, और अब यह रसखान हमारे किसी काम के नहीं हैं। उस्तादजी रसखान को वहीं छोड़कर हज पर चले गए। रसखान को जब होश आया तो फिर वो कृष्ण को ढूँढने लगे। आस-पास आने-जाने वाले मुसाफ़िर से पूछने लगे तुमने कहीं साँवला सलोना, जिनके हाथ में मुरली है, साथ में उनकी बेगम (श्री राधा जी) भी हैं, कही देखा है, वो कहाँ रहता है? किसी भक्त ने उनकी विरह दशा देखकर श्री बाँकेबिहारी जी के मंदिर का पता बता दिया। रसखान मंदिर गये, किन्तु उनकी दशा देखकर मंदिर के अंदर पुजारी ने प्रवेश करने नहीं दिया। वो वहीं मंदिर के बाहर तीन दिनों तक भूखे-प्यासे पड़े रहे। तीसरे दिन बाँकेबिहारीजी अपना प्रिय दूध-भात चाँदी के कटोरे में लेकर आए और उन्हें अपने हाथों से खिलाया।
जय जय श्री बाँकेबिहारी लाल की..











कृष्ण भक्ती

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Friday, November 13, 2015



आखिर क्यों होते है माला में 108 दाने ?

रुद्राक्ष माला


हिन्दू पौराणिक शास्त्रों के अनुसार हम मंत्र जप के लिए जिस माला का उपयोग करते है, उसमें दानों की संख्या 108 होती है। शास्त्रों में 108 संख्या  का अत्यधिक महत्व है। इसके पीछे कई धार्मिक, ज्योतषिक और वैज्ञानिक मान्यताएं हैं, कि माला में 108 ही दाने क्यों होते हैं| आइए हम यहां जानते है ऐसी ही कुछ मान्यताओ के बारे में और जानेंगे आखिर माला का प्रयोग क्यों करना चाहिए मन्त्र जाप के लिए।

हिन्दू ग्रंथों के अनुसार रुद्राक्ष से बनी माला मंत्र जप के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। रुद्राक्ष को महादेव का प्रतीक माना गया है। रुद्राक्ष में सूक्ष्म कीटाणुओं का नाश करने की शक्ति भी होती है और रुद्राक्ष वातावरण में मौजूद सकारात्मक ऊर्जा को ग्रहण करके साधक के शरीर में पहुंचा देता है। रुद्राक्ष से अलग यह माला तुलसी, स्फटिक, मोती या नगों से भी बनी होती है। प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े तपस्वी, साधु-संत इस उपाय को अपनाते रहे हैं।

शास्त्रों में लिखा है कि-

1.) बिना दमैश्चयकृत्यं सच्चदानं विनोदकम्।असंख्यता तु यजप्तं तत्सर्व निष्फलं भवेत्।।


इस श्लोक का तात्पर्य है कि भगवान की पूजा के लिए कुश का आसन बहुत जरूरी है, इसके बाद दान-पुण्य जरूरी है। जब भी मंत्र जप करें, माला का उपयोग अवश्य करना चाहिए। माला के बिना संख्याहीन किए गए मंत्र जप का भी पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता है। जो भी व्यक्ति माला की मदद से मंत्र जप करता है, उसकी मनोकामनएं बहुत जल्द पूर्ण होती हैं। मंत्र जप निर्धारित संख्या 108 के अनुसार किए जाए तो सर्व श्रेष्ठ रहता है।

षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकं विशांति।एतत् संख्यान्तितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा।।


शास्त्रों के अनुसार एक पूर्ण रूप से स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में जितनी बार सांस लेता है, व्यक्ति के सांस से ही माला के दानों की संख्या 108 का संबंध है। सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति करीब 21600 बार सांस लेता है। दिन के 24 घंटों में से 12 घंटे दैनिक कार्यों में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति सांस लेता है 10800 बार। शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर यानी पूजन के लिए निर्धारित समय 12 घंटे में 10800 बार ईश्वर का ध्यान करना चाहिए, लेकिन यह संभव नहीं हो पाता है। इसीलिए 10800 बार सांस लेने की संख्या से अंतिम दो शून्य हटाकर जप के लिए 108 संख्या निर्धारित की गई है। इसी संख्या के आधार पर जप की माला में 108 दाने होते हैं।

वैज्ञानिक महत्त्व: सूर्य की एक–एक कला का प्रतीक होता है माला का एक–एक दाना:-

वैज्ञानिकों के अनुसार माला के 108 दाने और सूर्य की कलाओं का गहरा संबंध है। एक वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता है और वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छह माह उत्तरायण रहता है और छह माह दक्षिणायन। अत: सूर्य छह माह की एक स्थिति में 108000 बार कलाएं बदलता है। इसी संख्या 108000 से अंतिम तीन शून्य हटाकर माला के 108 मोती निर्धारित किए गए हैं। माला का एक-एक दाना सूर्य की एक-एक कला का प्रतीक है। सूर्य ही व्यक्ति को तेजस्वी बनाता है, सूर्य ही एकमात्र साक्षात दिखने वाले देवता हैं, इसी वजह से सूर्य की कलाओं के आधार पर दानों की संख्या 108 निर्धारित की गई है।


रुद्राक्ष माला

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आज कल  की भक्ति. 

आज कल  की भक्ति. 


एक बार भगवान नारायण लक्ष्मी जी को बोले, “लोगो में कितनी भक्ति बढ़ गयी है …. सब “नारायण नारायण” करते है!”..तो लक्ष्मी जी बोली, “आप को पाने के लिए नहीं!:-) मेरे को पाने के लिए भक्ति बढ़ गयी है!”..तो भगवान बोले, “लोग “लक्ष्मी लक्ष्मी” ऐसा जप थोड़े ही ना करते है!”
..तो माता लक्ष्मी बोली की , “विश्वास ना हो तो परीक्षा हो जाए!"
..भगवान नारायण एक गाँव में ब्राम्हण का रूप लेकर गए…एक घर का दरवाजा खटखटाया…घर के यजमान ने दरवाजा खोल कर पूछा , “कहाँ के है?”तो भगवान बोले, “हम तुम्हारे नगर में भगवान का कथा कीर्तन करना चाहते है….यजमान बोला, “ठीक है महाराज, जब तक कथा होगी आप मेरे घर में रहेना .गाँव के कुछ लोग इकठठा हो के सब तैय्यारी कर दी….पहेले दिन कुछ लोग आये…अब भगवान स्वयं कथा करते तो गर्दी बढ़ी! 2रे 3 रे दिन और भी भीड़ हो गयी….भगवान खुश हो गए..की कितनी भक्ति है लोगो में….!लक्ष्मी माता ने सोचा अब जाने जैसा है !..लक्ष्मी माता ने बुढ्ढी माता का रूप लिया….और उस नगर में पहुंची…. एक महिला ताला बंद कर के कथा में जा रही थी की , माता पहुंची! बोली, “बेटी ज़रा पानी पिला दे!”तो वो महिला बोली,”माताजी , साढ़े 3 बजे है…मेरे को प्रवचन में जाना है!”.लक्ष्मी माता बोली..”पिला दे बेटी थोडा पानी…बहोत प्यास लगी है..”तो वो महिला लोटा भर के पानी लायी….माता ने पिया और लोटा लौटाया तो सोने का हो गया था!! .महिला अचंबित हो गयी की लोटा दिया था तो स्टील का और वापस लिया तो सोने का! कैसे चमत्कारिक माता जी है!..अब तो वो महिला हाथा-जोड़ी करने लगे की , “माताजी आप को भूख भी लगी होगी ..खाना भी खा लीजिये..!” ये सोचे की खाना खाएगी तो थाली भी, कटोरी भी सोने की हो जाए!!
माता लक्ष्मी बोली, “तुम जा बेटी, तेरा टाइम हो गया!”..वो महिला प्रवचन में तो आई तो सही …लेकिन आस-पास की महिलाओं को सारी बात बतायी….अब महिलायें वो बात सुनकर चालु सत्संग में से उठ के गयी !!
दुसरे दिन से कथा में लोगो की संख्या कम हो गयी….तो भगवान ने पूछा की , “लोगो की संख्या कैसे कम हो गयी?…. किसी ने कहा एक चमत्कारिक माताजी आई है नगर में… जिस के घर दूध पीती तो ग्लास सोने का हो जाता…. थाली में रोटी सब्जी खाती तो थाली सोने की हो जाती!… उस के कारण लोग प्रवचन में नहीं आते..”
..भगवान नारायण समझ गए की लक्ष्मी जी का आगमन हो चुका है! इतनी बात सुनते ही देखा की जो यजमान सेठ जी थे, वो भी उठ खड़े हो गए….. खिसक गए! पहुंचे माता लक्ष्मी जी के पास! बोले, “ माता मैं तो भगवान की कथा का आयोजन करता और लक्ष्मी जी माता आप ने मेरे घर को छोड़ दिया!”माता लक्ष्मी बोली, “तुम्हारे घर तो मैं सब से पहेले आनेवाली थी!लेकिन तुम्हारे घर में जिस कथाकार को ठहेराया है ना , वो चला जाए तो मैं अभी आऊं !”सेठ जी बोला, “बस इतनी सी बात!… अभी उन को धरम शाला में कमरा दिलवा देता हूँ!”
..जैसे ही महाराज कथा कर के घर आये तो सेठ जी बोला, “महाराज बिस्तरा बांधो!आप की व्यवस्था धरम शाला में कर दी है!!”महाराज बोले, “ अभी 2/3 दिन बचे है कथा के….. यही रहेने दो”सेठ बोला, “नहीं नहीं, जल्दी जाओ!मैं कुछ नहीं सुनने वाला!”.इतने में लक्ष्मी जी आई , कहा की , “सेठ जी , आप थोड़ा बाहर जाओ… मैं इन से निबट लूँ!”
माता लक्ष्मी जी बोली, “प्रभु , अब तो मान गए?”

आज कल की भक्ति.

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