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Monday, December 21, 2015

मोक्षदा एकादशी(गीता जयंती)

मोक्षदा एकादशी(गीता जयंती)


पद्मपुराणमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं-इस दिन तुलसी की मंजरी, धूप-दीप आदि से भगवान दामोदर का पूजन करना चाहिए। मोक्षदाएकादशी बडे-बडे पातकों का नाश करने वाली है। इस दिन उपवास रखकर श्रीहरिके नाम का संकीर्तन, भक्तिगीत, नृत्य करते हुए रात्रि में जागरण करें।

पूर्वकाल में वैखानस नामक राजा ने पर्वत मुनि के द्वारा बताए जाने पर अपने पितरोंकी मुक्ति के उद्देश्य से इस एकादशी का सविधि व्रत किया था। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से राजा वैखानस के पितरोंका नरक से उद्धार हो गया। जो इस कल्याणमयीमोक्षदा एकादशी का व्रत करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। प्राणियों को भवबंधन से मुक्ति देने वाली यह एकादशी चिन्तामणि के समान समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। मोक्षदा एकादशी की पौराणिक कथा पढने-सुनने से वाजपेययज्ञ का पुण्यफलमिलता है।

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन ही कुरुक्षेत्र में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीताका उपदेश दिया था। अत:यह तिथि गीता जयंती के नाम से विख्यात हो गई। इस दिन से गीता-पाठ का अनुष्ठान प्रारंभ करें तथा प्रतिदिन थोडी देर गीता अवश्य पढें। गीतारूपीसूर्य के प्रकाश से अज्ञानरूपीअंधकार नष्ट हो जाएगा।
श्रीमद्भागवत गीता और श्रीमद्भागवत पुराण के आधार पर उस परम सनातन नियम को व्यक्त किया गया है। मोक्षदा एकादशी को श्री कृष्ण का पूजन कर व्रत रखने का विधान है इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ग्रह शांति के लिए इस व्रत को करने से उत्तम फलों की प्राप्ति होती है। घर पर मंडरा रहे संकटों के बादल समाप्त होते हैं और स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।

मोक्ष प्रदान करता है ये व्रत

महाभारत के युद्ध के समय जब अर्जुन मोहग्रस्त हो गए थे तब भगवान श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर अर्जुन के मोह का निवारण किया था। उस दिन मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी। तभी से इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, इस दिन भगवान दामोदर की विधि-विधान से पूजा करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मोक्षदा एकादशी पर श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए गीता के उपदेश से जिस प्रकार अर्जुन का मोहभंग हुआ था, वैसे ही इस एकादशी के प्रभाव से व्रती को लोभ, मोह, द्वेष और समस्त पापों से छुटकारा मिल जाता है। पद्म पुराण में ऐसा उल्लेख आया है कि इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है और पितरों को सद्गति मिलती है। माना जाता है कि इस व्रत की केवल कथा सुनने से ही हजारों यज्ञ का फल मिलता है

क्या करें

1 सुख प्राप्ति के लिए श्री नाराय़ण के चित्र पर सिंदूर चढ़ाएं।

2 धन प्राप्ति के लिए श्री भगवान मधुसूदन के चित्र पर कमल गट्टे चढ़ाएं।

3 पराक्रम बढ़ाने के लिए श्री हरि के चित्र पर तुलसी पत्र चढ़ाएं।

4 गृह क्लेश से मुक्ति पाने के लिए श्री बाल गोपाल को दही का भोग लगाएं।

5 प्रेम में सफलता के लिए श्री राधा-कृष्ण पर रोली चढ़ाएं।

6 रोग मुक्ति के लिए श्री हरि पर मूंग चढ़ाएं।

7 सुखी दांपत्य के लिए लक्ष्मी-नारायण पर अबीर चढ़ाएं।

8 दुर्घटनाओं से सुरक्षा के लिए भगवान बांके बिहारी पर लाल चंदन चढ़ाएं।

9 सौभाग्य प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु के चित्र पर हल्दी चढ़ाएं।

10 व्यवसायिक सफलता के लिए श्री कृष्ण पर नीले फूल चढ़ाएं।

11 लाभ प्रप्ति के लिए श्री नारायण पर लोहबान से धूप करें।

12 हानि से बचने के लिए भगवान विष्णु के चित्र पर पीले फूल चढ़ाएं।

 क्या न करें

1 पान न खाएं।

2 किसी की निन्दा न करें।

3 क्रोध न करें।

4 झूठ न बोलें।

5 दिन के समय न सोएं।

6 तेल में बना हुआ खाना न खाएं।

7 कांसे के बर्तनों का इस्तेमाल न करें।

8 व्रत न रख सकें तो प्याज, लहसुन और चावल का सेवन न करें।

मोक्षदा एकादशी(गीता जयंती)

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Thursday, December 3, 2015

गीता का रहस्य

गीता का रहस्य

गीता रहस्य भगवान श्री कृष्ण के निष्काम कर्मयोग के विशाल उपवन से चुने हुए आध्यात्मिक सत्यों के सुन्दर गुणों का एक गुच्छा है। इस गुच्छे की व्याख्या विभिन्न महापुरुषों द्वारा समय-समय पर की गई है
इस ग्रंथ के माध्यम से बताया कि गीता चिन्तन उन लोगों के लिए नहीं है जो स्वार्थपूर्ण सांसारिक जीवन बिताने के बाद अवकाश के समय खाली बैठ कर पुस्तक पढ़ने लगते हैं और यह संसारी लोगों के लिए कोई प्रारंभिक शिक्षा है। इसमें यह दार्शनिकता निहित है कि हमें मुक्ति की ओर दृष्टि रखते हुए सांसारिक कर्तव्य कैसे करने चाहिए। इस ग्रंथ में उन्होंने मनुष्य को उसके संसार में वास्तविक कर्तव्यों का बोध कराया है।

श्रीमद्भगवद्गीता हमारे धर्मग्रंथों का एक अत्यंत तेजस्वी और निर्मल हीरा है। भक्ति और ज्ञान का मेल कराके इन दोनों का शास्त्रोंक्त व्यवहार के साथ संयोग करा देने वाला और इसके द्वारा संसार से त्रस्त मनुष्य को शांति देकर उसे निष्काम कर्तव्य के आचरण में लगानेवाला गीता के समान बालबोध ग्रंथ, समस्त संसार के साहित्य में भी नहीं मिल सकता। केवल काव्य की ही दृष्टि से यदि इसकी परीक्षा की जाए तो भी यह ग्रंथ उत्तम काव्यों में गिना जा सकता है; क्योंकि इसमें आत्मज्ञान के अनेक गूढ़ सिद्धांत ऐसी प्रासादिक भाषा में लिखे गए हैं, इसमें ज्ञानयुक्त भक्तिरस भी भरा पड़ा है। जिस ग्रंथ में समस्त वैदिक धर्म का सार स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् की वाणी से संगृहित किया है उसकी योग्यता का वर्णन कैसे किया जाए ?

‘‘प्रत्यक्ष अनुभव से यह स्पष्ट दिखाई देता है, कि श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान युग में भी उतनी ही नव्यतापूर्ण एवं स्फूर्तिदात्री है, जितनी की महाभारत में समाविष्ट होते समय भी। गीता के संदेश का प्रभाव केवल दार्शनिक अथवा विद्वत्वर्चा का विषय नहीं है, अपितु आचार-विचारों के क्षेत्र में भी वह सदैव जीता-जागता प्रतीत होता है। एक राष्ट्र तथा संस्कृति का पुनरुज्जीवन, गीता का उपदेश, करता रहा है। संसार के अत्युच्च शास्त्रविषयक ग्रंथों में गीता का अविरोध से समावेश हुआ है। -

श्रीमद्भगवद्गीता का रहस्य

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श्रीमद भगवत गीता  की महिमा

श्रीमद भगवत गीता की महिमा

वास्तव मे श्रीमद भगवत गीता महात्म्य वाणी द्वारा वर्णन करने के लिए किसी की भी सामथ्य नहीं है ; क्योकि यह एक परम रहस्यमय ग्रन्थ है ! इसमे सम्पूर्ण वेदों का सार - सार संग्रह किया गया है ! इसकी संस्कृत इतनी सुंदर और सरल है कि थोड़ी अभ्यास करने से मनुष्य उसको सहज ही समझ सकता है ; परन्तु इसका आशय इतना गम्भीर है कि आजीवन निरंतर अभ्यास करते रहने पर भी उसका अंत नहीं आता ! प्रतिदिन नये - नये भाव उत्पन्न होते रहते है, इससे यह सदेव नवीन बना रहता है एवं एकाग्रचित होकर श्रद्धा -भक्ति सहित विचार करने से इसके पद -2 में परम रहस्य भरा हुआ प्रत्यछ प्रतीत होता है ! भगवान के गुण,प्रभाव और मर्मका वर्णन जिस प्रकार इस गीताशास्त्र में किया गया है ,वैसा अन्य ग्रंथो में मिलना कठिन है ;क्योकि प्राय: ग्रंथो में कुछ न कुछ सांसारिक विषय मिला रहता है ! भगवान ने "श्रीमध्दगवदिता" रूप एक एसा अनुपमेय शास्त्र कहा है कि जिसमे एक भी शब्द सदुपदेश से खाली नहीं है ! श्री वेदव्यास जी ने महाभारत में गीता का वर्णन करने के उपरांत कहा है----

गीता सुनीता कर्तब्य किमन्यौ: शास्त्रविस्तेर: !
या स्वयं पद्द्नाभस्य मुखपद्दद्दिनी: सृता !!



' गीता सुनीता करने योग्य है अर्थात श्री गीता जी को भली प्रकार पढ़कर अर्थ और भावसहित अंत: करण में धारण कर लेना मुख्य कर्तब्य है , जो की स्वयं पद्द्नाभ भगवान श्री विष्णु के मुखारविंद से निकली हुई है; फिर अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या प्रयोजन है ???
स्वयं श्रीभगवान ने भी इसके महत्म्यका वर्णन किया है !!!
इस गीताशास्त्र में मनुष्य मात्र का अधिकार है,चाहे वह किसी भी वर्ण,आश्रम में स्थित हो:परन्तु भगवान में श्रद्धालु और भक्तियुक्त अवश्य होना चाहिए; क्योकि भगवान ने अपने भक्तो में ही इसका प्रचार करने के लिए आज्ञा दी है तथा यह भी कहा है की स्त्री,वैश्य,शुद्र और पापयोनि भी मेरे परायण होकर परम गति को प्राप्त होते है ;
अपने -2 स्वाभाविक कर्मो द्वारा मेरी पूजा करके मनुष्य परम सिध्दि को प्राप्त होते है ;इन सबपर विचार करने से यही ज्ञात होता है कि परमात्मा की प्राप्ति में सभी का अधिकार है !
परन्तु उक्त विषय के मर्मको न समझने के कारण बहुत से मनुष्य,जिन्होंने श्री गीताजी का केवल नाम मात्र ही सुना है,कह दिया करते है की गीता तो केवल सन्यासियों के लिए ही है; वे अपने बालको को भी इसी भय से श्री गीताजी का अभ्यास नहीं कराते कि गीता के ज्ञान से कदाचित लड़का घर छोड़ कर संयासी न हो जाये; किन्तु उनको विचार करना चाहिए कि मोह के कारन छात्र धर्म से विमुख होकर भिक्षा के अन्नसे निर्वाह करने के लिए तैयार हुये अर्जुन ने जिस परम रहस्यमय गीता के उपदेश से आजीवन गृहस्थ में रहकर अपने कर्तब्य का पालन किया, उस गीताशास्त्र यह उलटा परिणाम किस प्रकार हो सकता है??????
अतएव कल्याणकारी इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा -भक्ति पूर्वक अपने बालको को अर्थ और भाव के साथ श्री गीताजी का अध्ययन कराये एवं स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान के आज्ञानुसार साधन करने में तत्पर हो जाए; क्योकि अति दुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमुल्य समय का एक क्षण भी दुःख मूलक क्षणभगुर भोगो के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है !!!!!!! 


श्रीमद भगवत गीता की महिमा

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Saturday, November 28, 2015

गीता के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक

गीता के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक





१. हम चिंता और शोक से कैसे छुटकारा पा सकते हैं ? - भ.गी. 2.22

२. शांति प्राप्त करने के लिए स्थिर मन और अलौकिक बुद्धि कैसे प्राप्त किया जाये ? - भ.गी.2.66

३. भगवान को अर्पित भोजन ही क्यों खाया जाये ? - भ.गी. 3.31

४. अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करते हुए भक्ति कैसे की जाये ? - भ.गी. 3.43

५. जीवन की पूर्णता को कैसे पाया जाये ? - भ.गी. 4.9

६. धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष को कैसे पाएं ? - भ.गी. 4.11

७. आध्यात्मिक गुरु का आश्रय कैसे लें ? - भ.गी. 4.34

८. क्या एक पापी भी दुखों के सागर को पार सकता है ? - भ.गी. 4.36

९. मनुष्य दुखों के जाल में क्यों फंसा हुआ है ? - भ.गी. 5.22

१०. शान्ति का सूत्र क्या है ? - भ.गी. 5.29

११. मन किसका मित्र है और किसका शत्रु ? - भ.गी. 6.6

१२. क्या मन को नियंत्रित करके शांति प्राप्त की जा सकती है ? - भ.गी. 6.7

१३. चंचल मन को कैसे नियंत्रित करें ? - भ.गी. 6.35

१४. पूर्ण ज्ञान क्या है ? - भ.गी. 7.2

१५. मुक्ति कैसे पाएं ? - भ.गी. 7.7

१६. माया को वश में करने का रहस्य क्या है ? - भ.गी. 7.14

१७. पाप-कर्म क्या हैं ? उन्हें कैसे हटाया जाये ? - भ.गी. 9.2

१८. हमारा परम-लक्ष्य क्या होना चाहिए ? - भ.गी. 9.18

१९. क्या कोई व्यक्ति अपनी इच्छा के ग्रह पर पहुँच सकता है ? - भ.गी. 9.25

२०. क्या भगवान हमारे द्वारा अर्पित भोजन ग्रहण करते हैं ? - भ.गी. 9.26

२१. इस भौतिक संसार में आनंद पाने के माध्यम क्या हैं ? - भ.गी. 9.34

२२. इस मनुष्य जन्म की पूर्णता क्या है ? - भ.गी. 10.10

२३. हमारे हृदयों में संचित मल को कैसे साफ़ किया जाये ? - भ.गी. 10.11

२४. परम पुरुषोत्तम भगवान कौन हैं ? - भ.गी. 10.12-13

२५. भगवान कृष्ण ने अर्जुन को विश्व-रूप क्यों दिखाया ? - भ.गी. 11.1

२६. भगवद-गीता का सार क्या है और हमारे दुखों का कारण क्या है ? - भ.गी. 11.55

२७. रजोगुण एवं तमोगुण पर विजय कैसे प्राप्त करें ? - भ.गी. 14.26

२८. क्या हम भगवान को देख, सुन और उनसे बात कर सकते हैं ? - भ.गी. 15.7

२९. जीव शरीर छोड़ते समय साथ में क्या ले जाता है ? - भ.गी. 15.8

३०. भगवान को कैसे पाया जाये ? - भ.गी. 18.66

हरे कृष्ण

गीता के कुछ महत्वपूर्ण श्लोक

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Friday, November 20, 2015

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1.

श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1.

सारांश

गीता जी के अध्याय 1 के श्लोक 1 से 19 तक इन श्लोकों में संजय सेना की स्थिति तथा सेना में आए गणमान्य योद्धाओं के बारे में जानकारी धृतराष्ट्र को दे रहा है। गीता अध्याय 1 के श्लोक 20 से 23 श्लोकों में अर्जुन कह रहा है कि भगवन्! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में ले चलो ताकि देख लूं कि मेरे सामने टिकने वाले कौन कौन से योद्धा हैं।

गीता अध्याय 1 के श्लोक 24, 25 में वर्णन है कि भगवान कृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य में खड़ा करके अर्जुन से कहा कि देख सामने खड़े राजाओं तथा कुरुवंशियों को। गीता अध्याय 1 के श्लोक 26 से 45 तक के श्लोकों में वर्णन है कि अर्जुन ने युद्ध के लिए तत्पर अपने ही सम्बन्धियों को, पुत्रों व पौत्रों को, साले ससुरों को मरने मारने के लिए आए हुए देखा तथा श्री कृष्ण जी से विशेष विवेक से कहा कि सामने खड़े मासूम बच्चों, अपने साथी व चचेरे भाईयों व सम्बन्धियों को देखकर मेरा शरीर काँप रहा है। धनुष हाथ से गिर रहा है। मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा हूँ। अपने ही जनों को मारना अच्छा महसूस नहीं कर रहा हूँ। हे कृष्ण! न तो मैं विजय चाहता हूँ, न ही राज्य का सुख। चूंकि उनको जो स्वयं अपने राज्य व जान की परवाह (चिंता) न करके मरने को तैयार हैं उन्हें मार कर मैं राज्य नहीं चाहता। मैं बन्धुओं व पुत्र तथा पौत्रों को मारना नहीं चाहता। चाहे मुझे तीनों लोकों का राज्य भी क्यांे न मिलता हो, फिर पृथ्वी के राज्य के लिए तो क्यों पाप करूँ? इनको मारने से तो पाप ही लगेगा। ऐसे कुकर्म करके हम कैसे सुखी हो सकते हैं? ये सामने खड़े राजा लोग तो मोह माया में अंधे हो रहे हैं। फिर हमें तो ज्ञान है। ऐसा क्यों करें कि कुल का नाश होने पर दूसरे दुष्कर्मी लोग हमारी स्त्रिायों को बलात तंग करेंगे। वर्णशंकर संतान हो जाएगी। पतिव्रता धर्म नष्ट हो जाएगा तथा धर्म कर्म न करने से नरक के भागी हो जाएंगे। वास्तव में हम बहुत पापी हैं जो अपने ही बन्धुओं को स्वार्थ वश मारने को तैयार हो गये हैं। गीता अध्याय 1 के श्लोक 46 में अर्जुन ने कहा कि भगवन इस पाप को बचाने के लिए यदि धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ निहत्थे को मार दें और युद्ध न हो, तो भी मैं स्वयं मरना बेहतर समझता हूँ कि एक मेरे मरने से लाखों बहन विधवा होने से बच जाएंगी तथा लाखों मासूम बच्चे अनाथ होने से बच जाएंगे। गीता अध्याय 1 के श्लोक 47 में यह कह कर अर्जुन दुःखी मन से रथ के बीच वाले हिस्से में बैठ गया तथा धनुषको रख दिया।


श्रीमद् भगवद् गीता अध्याय 1.

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पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा.

पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा.


पवित्र गीता जी के ज्ञान को उस समय बोला गया था जब महाभारत का युद्ध होने जा रहा था। अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया था। युद्ध क्यों हो रहा था? इस युद्ध को धर्मयुद्ध की संज्ञा भी नहीं दी जा सकती क्योंकि दो परिवारों का सम्पत्ति वितरण का विषय था। कौरवों तथा पाण्डवों का सम्पत्ति बंटवारा नहीं हो रहा था। कौरवों ने पाण्डवों को आधा राज्य भी देने से मना कर दिया था। दोनों पक्षों का बीच-बचाव करने के लिए प्रभु श्री कृष्ण जी तीन बार शान्ति दूत बन कर गए। परन्तु दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जिद्द पर अटल थे। श्री कृष्ण जी ने युद्ध से होने वाली हानि से भी परिचित कराते हुए कहा कि न जाने कितनी बहन विधवा होंगी ? न जाने कितने बच्चे अनाथ होंगे ? महापाप के अतिरिक्त कुछ नहीं मिलेगा। युद्ध में न जाने कौन मरे, कौन बचे ? तीसरी बार जब श्री कृष्ण जी समझौता करवाने गए तो दोनों पक्षों ने अपने-अपने पक्ष वाले राजाओं की सेना सहित सूची पत्र दिखाया तथा कहा कि इतने राजा हमारे पक्ष में हैं तथा इतने हमारे पक्ष में। जब श्री कृष्ण जी ने देखा कि दोनों ही पक्ष टस से मस नहीं हो रहे हैं, युद्ध के लिए तैयार हो चुके हैं। तब श्री कृष्ण जी ने सोचा कि एक दाव और है वह भी आज लगा देता हूँ। श्री कृष्ण जी ने सोचा कि कहीं पाण्डव मेरे सम्बन्धी होने के कारण अपनी जिद्द इसलिए न छोड़ रहे हों कि श्री कृष्ण हमारे साथ हैं, विजय हमारी ही होगी(क्योंकि श्री कृष्ण जी की बहन सुभद्रा जी का विवाह श्री अर्जुन जी से हुआ था)। श्री कृष्ण जी ने कहा कि एक तरफ मेरी सर्व सेना होगी और दूसरी तरफ मैं होऊँगा और इसके साथ-साथ मैं वचन बद्ध भी होता हूँ कि मैं हथियार भी नहीं उठाऊँगा। इस घोषणा से पाण्डवों के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई। उनको लगा कि अब हमारी पराजय निश्चित है। यह विचार कर पाँचों पाण्डव यह कह कर सभा से बाहर गए कि हम कुछ विचार कर लें। कुछ समय उपरान्त श्री कृष्ण जी को सभा से बाहर आने की प्रार्थना की। श्री कृष्ण जी के बाहर आने पर पाण्डवों ने कहा कि हे भगवन् ! हमें पाँच गाँव दिलवा दो। हम युद्ध नहीं चाहते हैं। हमारी इज्जत भी रह जाएगी और आप चाहते हैं कि युद्ध न हो, यह भी टल जाएगा।

पाण्डवों के इस फैसले से श्री कृष्ण जी बहुत प्रसन्न हुए तथा सोचा कि बुरा समय टल गया। श्री कृष्ण जी वापिस आए, सभा में केवल कौरव तथा उनके समर्थक शेष थे। श्री कृष्ण जी ने कहा दुर्योधन युद्ध टल गया है। मेरी भी यह हार्दिक इच्छा थी। आप पाण्डवों को पाँच गाँव दे दो, वे कह रहे हैं कि हम युद्ध नहीं चाहते। दुर्योधन ने कहा कि पाण्डवों के लिए सुई की नोक तुल्य भी जमीन नहीं है। यदि उन्हंे राज्य चाहिए तो युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र के मैदान में आ जाऐं। इस बात से श्री कृष्ण जी ने नाराज होकर कहा कि दुर्योधन तू इंसान नहीं शैतान है। कहाँ आधा राज्य और कहाँ पाँच गाँव? मेरी बात मान ले, पाँच गाँव दे दे। श्री कृष्ण से नाराज होकर दुर्योधन ने सभा में उपस्थित योद्धाओं को आज्ञा दी कि श्री कृष्ण को पकड़ो तथा कारागार में डाल दो। आज्ञा मिलते ही योद्धाओं ने श्री कृष्ण जी को चारों तरफ से घेर लिया। श्री कृष्ण जी ने अपना विराट रूप दिखाया। जिस कारण सर्व योद्धा और कौरव डर कर कुर्सियों के नीचे घुस गए तथा शरीर के तेज प्रकाश से आँखें बंद हो गई। श्री कृष्ण जी वहाँ से निकल गए।

आओ विचार करें:- उपरोक्त विराट रूप दिखाने का प्रमाण संक्षिप्त महाभारत गीता प्रैस गोरखपुर से प्रकाशित में प्रत्यक्ष है। जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पवित्र गीता जी का ज्ञान सुनाते समय अध्याय 11 श्लोक 32 में पवित्र गीता बोलने वाला प्रभु कह रहा है कि ‘अर्जुन मैं बढ़ा हुआ काल हूँ। अब सर्व लोकों को खाने के लिए प्रकट हुआ हूँ।‘ जरा सोचें कि श्री कृष्ण जी तो पहले से ही श्री अर्जुन जी के साथ थे। यदि पवित्र गीता जी के ज्ञान को श्री कृष्ण जी बोल रहे होते तो यह नहीं कहते कि अब प्रवत्र्त हुआ हूँ। फिर अध्याय 11 श्लोक 21 व 46 में अर्जुन कह रहा है कि भगवन् ! आप तो ऋषियों, देवताओं तथा सिद्धों को भी खा रहे हो, जो आप का ही गुणगान पवित्र वेदों के मंत्रों द्वारा उच्चारण कर रहे हैं तथा अपने जीवन की रक्षा के लिए मंगल कामना कर रहे हैं। कुछ आपके दाढ़ों में लटक रहे हैं, कुछ आप के मुख में समा रहे हैं। हे सहò बाहु अर्थात् हजार भुजा वाले भगवान ! आप अपने उसी चतुर्भुज रूप में आईये। मैं आपके विकराल रूप को देखकर धीरज नहीं कर पा रहा हूँ।

अध्याय 11 श्लोक 47 में पवित्र गीता जी को बोलने वाला प्रभु काल कह रहा है कि ‘हे अर्जुन यह मेरा वास्तविक काल रूप है, जिसे तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा था।‘ उपरोक्त विवरण से एक तथ्य तो यह सिद्ध हुआ कि कौरवों की सभा में विराट रूप श्री कृष्ण जी ने दिखाया था तथा यहाँ युद्ध के मैदान में विराट रूप काल (श्री कृष्ण जी के शरीर मंे प्रेतवत् प्रवेश करके अपना विराट रूप काल) ने दिखाया था। नहीं तो यह नहीं कहता कि यह विराट रूप तेरे अतिरिक्त पहले किसी ने नहीं देखा है। क्योंकि श्री कृष्ण जी अपना विराट रूप कौरवों की सभा में पहले ही दिखा चुके थे।

दूसरी यह बात सिद्ध हुई कि पवित्र गीता जी को बोलने वाला काल(ब्रह्म-ज्योति निरंजन) है, न कि श्री कृष्ण जी। क्योंकि श्री कृष्ण जी ने पहले कभी नहीं कहा कि मैं काल हूँ तथा बाद में कभी नहीं कहा कि मैं काल हूँ। श्री कृष्ण जी काल नहीं हो सकते। उनके दर्शन मात्र को तो दूर-दूर क्षेत्र के स्त्री तथा पुरुष तड़फा करते थे। यही प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 24. 25 में है जिसमें गीता ज्ञान दाता प्रभु ने कहा है कि बुद्धिहीन जन समुदाय मेरे उस घटिया (अनुत्तम) विद्यान को नहीं जानते कि मैं कभी भी मनुष्य की तरह किसी के सामने प्रकट नहीं होता। मैं अपनी योगमाया से छिपा रहता हूँ।

उपरोक्त विवरण से सिद्ध हुआ कि गीता ज्ञान दाता श्री कृष्ण जी नहीं है। क्योंकि श्री कृष्ण जी तो सर्व समक्ष साक्षात् थे। श्री कृष्ण नहीं कहते कि मैं अपनी योग माया से छिपा रहता हूँ। इसलिए गीता जी का ज्ञान श्री कृष्ण जी के अन्दर प्रेतवत् प्रवेश करके काल ने बोला था।

पवित्र श्रीमद्भगवत गीता जी का ज्ञान किसने कहा.

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श्रीमद् भगवद् गीता का महत्व

श्रीमद् भगवद् गीता का महत्व

कल्याण की इच्छा वाले मनुष्यों को उचित है कि मोह का त्याग कर अतिशय श्रद्धा-भक्तिपूर्वक अपने बच्चों को अर्थ और भाव के साथ श्रीगीताजी का अध्ययन कराएँ। 
स्वयं भी इसका पठन और मनन करते हुए भगवान की आज्ञानुसार साधन करने में समर्थ हो जाएँ क्योंकि अतिदुर्लभ मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर अपने अमूल्य समय का एक क्षण भी दु:खमूलक क्षणभंगुर भोगों के भोगने में नष्ट करना उचित नहीं है।
गीताजी का पाठ आरंभ करने से पूर्व निम्न श्लोक को भावार्थ सहित पढ़कर श्रीहरिविष्णु का ध्यान करें--

अथ ध्यानम्
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्यनाभं सुरेशं 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं 
वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

भावार्थ : जिनकी आकृति अतिशय शांत है, जो शेषनाग की शैया पर शयन किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो ‍देवताओं के भी ईश्वर और संपूर्ण जगत के आधार हैं, जो आकाश के सदृश सर्वत्र व्याप्त हैं, नीलमेघ के समान जिनका वर्ण है, अतिशय सुंदर जिनके संपूर्ण अंग हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किए जाते हैं, जो संपूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरण रूप भय का नाश करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुत: स्तुन्वन्ति दिव्यै: स्तवै-
र्वेदै: साङ्गपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगा:।
ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो-
यस्तानं न विदु: सुरासुरगणा देवाय तस्मै नम:।।

भावार्थ : ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्‍गण दिव्य स्तोत्रों द्वारा जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित तद्‍गत हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर गण (कोई भी) जिनके अन्त को नहीं जानते, उन (परमपुरुष नारायण) देव के लिए मेरा नमस्कार है।


श्रीमद्‍भगवद्‍गीता का पाठ करें

श्रीमद् भगवद् गीता का महत्व

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